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Dalit Literature

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Dalit Literature साहित्य समाज के प्रति प्रतिबद्ध होता हैं | वह समय का सजग प्रहरी हैं |साहित्य में मुखरित होनेवाले विषय ,समस्या ,प्रश्न समय के साथ परिभाषित होते रहते हैं |साहित्य परिवर्तन और प्रगति को लेकर चलता हैं |पर मानवीय मूल्यों एवं संवेदनाओं को वह दर किनार नहीं करता |वह समाज का जीता-जगता चल चित्र प्रस्तुत करते हुए समाज उन्नति की ओर दिशा निर्देश करता हैं | हिंदी साहित्य काल ,दर्शन ,वाद के भँवर से बहार निकलते हुए आज इक्कीसवी सदी में विमर्शों के दौर से गुजरता हुआ दिखाई देता हैं |युवा विमर्श ,घुमंतू विमर्श ,विकलांग विमर्श ,दलित विमर्श ,आदिवासी विमर्श ,स्त्री विमर्श ,अल्पसंख्यांक विमर्श आदि विमर्शो तथा आंदोलनों ने हिंदी साहित्य को एक नई दिशा प्रदान की हैं | दलित आत्मकथाओं की अंतर्व्यथा – मोहनदास नैमिशराय परिप्रेक्ष्य साठ के दशक में दलित आत्म-कथाओं का आना साहित्य में किसी जलजले से कम नहीं था. पहले यह तूफान महाराष्ट्र में आया फिर हिंदी साहित्य में भी इसे आना ही था. साहित्य में इसे हम परिवर्तन का क्रांतिकारी दौर भी कह सकते हैं. सामाजिक बदलाव की इस धारा का किसी ने समर्थन किया तो किसी न