Asur/Rakshas

लोक-कथा में असुर
मेरी बड़ी दादी बचपन में मुझे एक कथा सुनाती थी; जिसमें एक जंगल में दानवदूत की सुन्दर पुत्री हुआ करती थी। एक दिन उसकी अनुपस्थिति के बीच संध्या समय एक राजकुमार लड़की को मिला। उस असुर-पुत्र की कन्या ने बताया कि उसके पिता दैत्य (असुर) हैं, वे आएंगे तो उसे मार देंगे। इसलिए उसने मिट्टी की कोठिला (मृद्भांड) में उसे छुपा दिया। वह दानवादुत देर संध्या पहर लौटा तो, ‘‘छिः मानुख! छिः मानुख’’ करने लगा। उसे महसूस हो गया कि जरूर यहां कोई हमलोगों से भिन्न ‘मनुष्य’ आया है। बेटी से पूछा किंतु उसकी बेटी ने इस तरह की किसी बात से इन्कार किया। बेटी का कुशल-मंगल लेने के बाद वह चला गया। उसके जाने के उपरान्त असुर पुत्री ने राजकुमार को कोठिले से बाहर निकाला और उसे खाना खिलाया। खाना खिलाते वक्त दोनों के बीच कई संवाद हुए। वे दोनों एक दूसरे को चाहने लगे। राजकुमार ने असुर पुत्री से पूछा ‘‘आपके पिता का प्राण कहां बसता है?’’ इस पर उसने बताया कि उसके पिता का प्राण ताड़ के पेड पर रहने वाले एक सुन्दर पंछी में बसता है। अगले दिन राजकुमार ने ताड़ पर के उस तोते (सुग्गा) का गर्दन ऐंठ दिया। तोते के गर्दन के ऐंठ जाते ही वह असुर दानवादुत भी मर गया। उसके मरने के बाद असुर पुत्री और राजकुमार के बीच शादी हो गई।’’

यह लोक कथा बताती है कि दानव और मानुष के बीच संबंध बनते थे। दानव, मनुष्य से भिन्न नहीं थे। यह उन्हीं की तरह थे। इतना ही नहीं, इस लोक-कथा में इस बात का आना की उस असुर दानव का प्राण ताड़ के उस तोते में बसता था, जो ताड़ के कोटर में रहता था, यह साबित करता है कि असुरों का बहुत गहन का लगाव मनुष्येत्तर प्राणियों से भी था। इतना कि उसकी जान चली जाने पर उसके भी प्राण निकल जाते थे!

आज हम हिंदी कथा-सम्राट प्रेमचंद की कुछ कहानियों में मनुष्यों का मनुष्येत्तर प्राणियों से लगाव के सवाल पर विचार-विमर्श आयोजित करते हैं। महादेवी वर्मा की ‘सोना’, ‘गौरा’, और ‘गिल्लू’ की चर्चा करते हैं, तो लोक-कथाओं में फैले असुरों का मनुष्येत्तर प्राण्यिों से लगाव को हम नजरअंदाज क्यों करते हैं? क्या यह एक विकृत मानसिकता का द्योतक नहीं कि हम सुरों में हर जगह आंख मूंदकर मानवता का दर्शन कर लेते हैं और असुर और दानवों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित हमारा मन उनकी नकारात्मक छवि प्रस्तुत करता है? इस पर भी तो ‘छिः मानुख’ होना चाहिए।

राक्षस वंश

वायु पुराण (70.51.65) में राक्षसों को पुलह, पुलस्त्य, कश्यप एवं अगस्त्य ऋषि की संतान माना गया है। दैत्यों में से हिरण्यकशिपु एवं हिरण्याक्ष का स्वतंत्र वंश वर्णन है। पौराणिक साहित्य में असुर (दैत्य), दानव एवं राक्षस जातियों का वर्णन मिलता है, जो सभी कश्यप ऋषि की संतानें हैं।

वृत्रासुर 

कहते हैं कि इंद्र का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी वृत्रासुर ही था। यह सतयुग की बात है जब कालकेय नाम के एक राक्षस का संपूर्ण धरती पर आतंक था। वह वत्रासुर के अधीन रहता था। दोनों से त्रस्त होकर सभी देवताओं ने मिलकर सोचा वृत्रासुर का वध करना अब जरूरी हो गया। इस वृत्तासुर के वध के लिए ही दधीचि ऋषि की हड्डियों से एक हथियार बनाया जिसका नाम वज्र था। वृत्रासुर एक शक्तिशाली असुर था जिसने आर्यों के नगरों पर कई बार आक्रमण करके उनकी नाक में दम कर रखा था। अंत में इन्द्र ने मोर्चा संभाला और उससे उनका घोर युद्ध हुआ जिसमें वृत्रासुर का वध हुआ। इन्द्र के इस वीरतापूर्ण कार्य के कारण चारों ओर उनकी जय-जयकार और प्रशंसा होने लगी थी।

शोधकर्ता मानते हैं कि वृत्रासुर का मूल नाम वृत्र ही था, जो संभवतः असीरिया का अधिपति था। पारसियों की अवेस्ता में भी उसका उल्लेख मिलता है। वृत्र ने आर्यों पर आक्रमण किया था तथा उन्हें पराजित करने के लिए उसने अद्विशूर नामक देवी की उपासना की थी। इन्द्र और वृत्रासुर के इस युद्ध का सभी संस्कृतियों और सभ्यताओं पर गहरा असर पड़ा था। तभी तो होमर के इलियड के ट्राय-युद्ध और यूनान के जियॅस और अपोलो नामक देवताओं की कथाएं इससे मिलती-जुलती हैं। इससे पता चलता है कि तत्कालीन विश्व पर इन्द्र-वृत्र युद्ध का कितना व्यापक प्रभाव पड़ा था।

शुक्र
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शुक्र

शुक्र वास्तविक रंग में, सतह बादलों की एक मोटी चादर से छिप गया है।
उपनाम
विशेषण Venusian or (rarely) Cytherean, Venerean
कक्षीय विशेषताएँ
युग J2000
उपसौर

10,89,39,000 किमी
0.728213 AU
अपसौर

10,74,77,000 किमी
0.718440 AU
अर्ध मुख्य अक्ष

10,82,08,000 किमी
0.723327 AU
विकेन्द्रता 0.006756
परिक्रमण काल

224.698 दिवस
0.615 190 वर्ष
1.92 शुक्र सौर दिवस
संयुति काल 583.92 days
औसत परिक्रमण गति 35.02 किमी/सेकंड
माध्य कोणान्तर 50.115°
झुकाव

3.394 58° क्रांतिवृत्त से
3.86° सूर्य के विषुववृत्त से
2.19° अविकारी तल से
आरोह पात का अनुलम्ब 76.678°
Argument of perihelion 55.186°
उपग्रह कोई नहीं
भौतिक विशेषताएँ
माध्य त्रिज्या

6,051.8 ± 1.0 km
0.9499 पृथ्वी
सपाटता 0
तल-क्षेत्रफल

4.60 x 108 किमी2
0.902 पृथ्वी
आयतन

9.28 x 1011 किमी3
0.866 पृथ्वी
द्रव्यमान

4.868 5×1024 किग्रा
0.815 पृथ्वी
माध्य घनत्व 5.243 ग्राम/सेमी3
विषुवतीय सतह गुरुत्वाकर्षण

8.87 मीटर/सेकंड2
पलायन वेग 10.36 किमी/सेकंड
काल −243.018 दिवस (प्रतिगामी)
विषुवतीय घूर्णन वेग 6.52
उत्तरी ध्रुव दायां अधिरोहण

18 घंटे 11 मिनट 2 सेकंड
272.76°
उत्तरी ध्रुवअवनमन 67.16°

सतह का तापमान
Celsius

न्यूनमाध्यअधि

735 K


462 °C



सर्वाधिक चमक −4.9(अर्धचंद्र)
−3.8 (पूर्णचंद्र)
वायु-मंडल
सतह पर दाब 92 bar (9.2 MPa)
संघटन


शुक्र (Venus), सूर्य से दूसरा ग्रह है और प्रत्येक 224.7 पृथ्वी दिनों मे सूर्य परिक्रमा करता है। ग्रह का नामकरण प्रेम और सौंदर्य की रोमन देवी पर हुआ है। चंद्रमा के बाद यह रात्रि आकाश में सबसे चमकीली प्राकृतिक वस्तु है। इसका आभासी परिमाण -4.6 के स्तर तक पहुँच जाता है और यह छाया डालने के लए पर्याप्त उज्जवलता है। चूँकि शुक्र एक अवर ग्रह है इसलिए पृथ्वी से देखने पर यह कभी सूर्य से दूर नज़र नहीं आता है: इसका प्रसरकोण 47.8 डिग्री के अधिकतम तक पहुँचता है। शुक्र सूर्योदय से पहले या सूर्यास्त के बाद केवल थोड़ी देर के लए ही अपनी अधिकतम चमक पर पहुँचता है। यहीं कारण है जिसके लिए यह प्राचीन संस्कृतियों के द्वारा सुबह का तारा या शाम का तारा के रूप में संदर्भित किया गया है।

शुक्र एक स्थलीय ग्रह के रूप में वर्गीकृत है और समान आकार, गुरुत्वाकर्षण और संरचना के कारण कभी कभी उसे पृथ्वी का "बहन ग्रह" कहा गया है। शुक्र आकार और दूरी दोनों मे पृथ्वी के निकटतम है। हालांकि अन्य मामलों में यह पृथ्वी से एकदम अलग नज़र आता है। शुक्र सल्फ्यूरिक एसिड युक्त अत्यधिक परावर्तक बादलों की एक अपारदर्शी परत से ढँका हुआ है। जिसने इसकी सतह को दृश्य प्रकाश में अंतरिक्ष से निहारने से बचा रखा है। इसका वायुमंडल चार स्थलीय ग्रहों मे सघनतम है और अधिकाँशतः कार्बन डाईऑक्साइड से बना है। ग्रह की सतह पर वायुमंडलीय दबाव पृथ्वी की तुलना मे 92 गुना है। 735° K (462°C,863°F) के औसत सतही तापमान के साथ शुक्र सौर मंडल मे अब तक का सबसे तप्त ग्रह है। कार्बन को चट्टानों और सतही भूआकृतियों में वापस जकड़ने के लिए यहाँ कोई कार्बन चक्र मौजूद नही है और ना ही ज़ीवद्रव्य को इसमे अवशोषित करने के लिए कोई कार्बनिक जीवन यहाँ नज़र आता है। शुक्र पर अतीत में महासागर हो सकते है लेकिन अनवरत ग्रीनहाउस प्रभाव के कारण बढ़ते तापमान के साथ वह वाष्पीकृत होते गये होंगे | पानी की अधिकांश संभावना प्रकाश-वियोजित (Photodissociation) रही होने की, व, ग्रहीय चुंबकीय क्षेत्र के अभाव की वजह से, मुक्त हाइड्रोजन सौर वायु द्वारा ग्रहों के बीच अंतरिक्ष में बहा दी गई है।शुक्र की भूमी बिखरे शिलाखंडों का एक सूखा मरुद्यान है और समय-समय पर ज्वालामुखीकरण द्वारा तरोताजा की हुई है।

असुर
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मैसूर में महिषासुर की प्रतिमा

हिन्दू धर्मग्रन्थों में असुर वे लोग हैं जो 'सुर' (देवताओं) से संघर्ष करते हैं। धर्मग्रन्थों में उन्हें शक्तिशाली, अतिमानवीय, अर्धदेवों के रूप में चित्रित किया गया है। ये अच्छे और बुरे दोनों गुणों वाले हैं। अच्छे गुणों वाले असुरों को 'अदित्य' तथा बुरे गुणों से युक्त असुरों को 'दानव' कहा गया है।

'असुर' शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में लगभग १०५ बार हुआ है। उसमें ९० स्थानों पर इसका प्रयोग 'शोभन' अर्थ में किया गया है और केवल १५ स्थलों पर यह 'देवताओं के शत्रु' का वाचक है। 'असुर' का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है- प्राणवंत, प्राणशक्ति संपन्न ('असुरिति प्राणनामास्त: शरीरे भवति, निरुक्ति ३.८) और इस प्रकार यह वैदिक देवों के एक सामान्य विशेषण के रूप में व्यवहृत किया गया है। विशेषत: यह शब्द इंद्र, मित्र तथा वरुण के साथ प्रयुक्त होकर उनकी एक विशिष्ट शक्ति का द्योतक है। इंद्र के तो यह वैयक्तिक बल का सूचक है, परंतु वरुण के साथ प्रयुक्त होकर यह उनके नैतिक बल अथवा शासनबल का स्पष्टत: संकेत करता है। असुर शब्द इसी उदात्त अर्थ में पारसियों के प्रधान देवता 'अहुरमज़्द' ('असुर: मेधावी') के नाम से विद्यमान है। यह शब्द उस युग की स्मृति दिलाता है जब वैदिक आर्यों तथा ईरानियों (पारसीकों) के पूर्वज एक ही स्थान पर निवास कर एक ही देवता की उपासना में निरत थे। अनंतर आर्यों की इन दोनों शाखाओं में किसी अज्ञात विरोध के कारण फूट पड़ी गई। फलत: वैदिक आर्यों ने 'न सुर: असुर:' यह नवीन व्युत्पत्ति मानकर असुर का प्रयोग दैत्यों के लिए करना आरंभ किया और उधर ईरानियों ने भी देव शब्द का ('द एव' के रूप में) अपने धर्म के दानवों के लिए प्रयोग करना शुरू किया। फलत: वैदिक 'वृत्रघ्न' (इंद्र) अवस्ता में 'वेर्थ्रोघ्न' के रूप में एक विशिष्ट दैत्य का वाचक बन गया तथा ईरानियों का 'असुर' शब्द पिप्रु आदि देवविरोधी दानवों के लिए ऋग्वेद में प्रयुक्त हुआ जिन्हें इंद्र ने अपने वज्र से मार डाला था। (ऋक्. १०।१३८।३-४)।

शतपथ ब्राह्मण की मान्यता है कि असुर देवदृष्टि से अपभ्रष्ट भाषा का प्रयोग करते हैं (तेऽसुरा हेलयो हेलय इति कुर्वन्त: पराबभूवु:)। पतञ्जलि ने अपने 'महाभाष्य' के पस्पशाह्निक में शतपथ के इस वाक्य को उधृत किया है। शबर स्वामी ने 'पिक', 'नेम', 'तामरस' आदि शब्दों को असूरी भाषा का शब्द माना है। आर्यों के आठ विवाहों में 'आसुर विवाह' का संबंध असुरों से माना जाता है। पुराणों तथा अवांतर साहित्य में 'असुर' एक स्वर से दैत्यों का ही वाचक माना गया है।

प्रमुख असुर
अंधक
अंधक एक जाट गोत्र है। यह भारत में हरियाणा, पंजाब राज्यों में पाया जाता है

कश्यप और दिति का पुत्र एक दैत्य, जो पौराणिक कथाओं के अनुसार हजार सिर, हजार भुजाओं वाला, दो हजार आँखों और दो हजार पैरों वाला था। शक्ति के मद में चूर वह आँख रहते अंधे की भाँति चलता था, इसी कारण उसका नाम अंधक पड़ गया था। स्वर्ग से जब वह परिजात वृक्ष ला रहा था तब शिव द्वारा वह मारा गया, ऐसी पौराणिक अनुश्रुति है।

क्रोष्ट्री नामक यादव का पौत्र और युधाजित का पुत्र, जो यादवों की अंधक शाखा का पूर्वज तथा प्रतिष्ठाता माना जाता है। जैसे अंधक से अंधकों की शाखा हुई, वैसे ही उसके भाई वृष्णि से वृष्णियों की शाखा चली। इन्हीं वृष्णियों में कालांतर में वार्ष्णेय कृष्ण हुए। महाभारत की परंपरा के अनुसार अंधकों और वृष्णियों के अलग-अलग गणराज्य भी थे, फिर दोनों ने मिलकर अपना एक संघराज्य (अंधक-वृष्णि-संघ) स्थापित कर लिया था।

बाणासुर

बलि के ज्येष्ठ पुत्र का नाम बाण था। बाण ने घोर तपस्या के फलस्वरूप शिव से अनेक दुर्लभ वर प्राप्त किये थे। अत: वह गर्वोन्मत्त हो उठा था। उसके एक सहस्त्र बांहें थीं। वह शोणितपुर पर राज्य करता था। उसकी एक सुंदरी कन्या थी, जिसका नाम उषा था। प्रद्युम्न का पुत्र अनिरुद्ध उस कन्या पर आसक्त हो गया तथा गुप्त रूप से उससे मिलता रहा। बाणसुर को विदित हुआ तो उसने दोनों को कारागार में डाल दिया। नारद ने श्रीकृष्ण से जाकर कहा-'आपके पौत्र अनिरुद्ध को बाणासुर विशेष कष्ट दे रहा है।' श्रीकृष्ण ने बलराम तथा प्रद्युम्न के साथ बाणासुर पर आक्रमण किया। महादेव बाणासुर की रक्षा के निमित्त वहां पहुंचे किंतु सबको परास्त कर तथा बाणासुर की समस्त बांहें काटकर और उसे मारकर श्रीकृष्ण, उषा और अनिरुद्ध को धन-धान्य सहित लेकर द्वारका पहुंचे। बाणासुर बलि के सौ पुत्रों में से ज्येष्ठ था। वह स्कंद को खेलता देख शिव की ओर आकृष्ट हुआ। उसने शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की। शिव ने वर मांगने को कहा तो उसने ये वर मांगे-

पार्वती उसे पुत्र-रूप में ग्रहण करें, वह स्कंद का छोटा भाई माना जाने लगा।
वह शिव से आरक्षित रहेगा

उसे अपने समान वीर से युद्ध करने का अवसर मिले। शिव ने कहा-'अपने स्थान पर स्थापित तुम्हारा ध्वज जब खंडित होकर गिर जायेगा तभी तुम्हें युद्ध का अवसर मिलेगा।' बाणासुर की एक सहस्त्र भुजाएं थीं। उसने अपने मन्त्री कुंभांड को समस्त घटनाओं के विषय में बताया तो वह चिंतित हो उठा। तभी इन्द्र के वज्र से उसकी ध्वजा टूटकर नीचे गिर गयी। बाणासुर की कन्या उषा ने वन में शिव-पार्वती को रमण करते देखा तो वह भी कामविमोहित होकर प्रिय-मिलन की इच्छा करने लगी। पार्वती ने उसे आशीर्वाद दिया कि वह अपने प्रिय के साथ पार्वती की भांति ही रमण कर पायेगी। स्वप्नदर्शन से वह अनिरुद्ध पर आसक्त हो गयी। चित्रलेखा ने अनिरुद्ध का अपहरण किया तथा उसी की सहायता से उषा का अनिरुद्ध से गांधर्व विवाह हो गया। बाणासुर को ज्ञात हुआ तो उसने अनिरुद्ध को नागपाश से आबद्ध कर लिया। आर्या देवी की आराधना से अनिरुद्ध उन पाशों से मुक्त हो गया। इधर नारद से समस्त समाचार जानकर श्रीकृष्ण यादववंशियों सहित बाणासुर के नगर की ओर बढ़े। नगर को चारों ओर से अग्नि ने घेर रखा था। अंगिरा उसकी सुरक्षा में थें गरुड़ ने हज़ारों मुख धारण करके गंगा से पानी लिया तथा अग्नि पर छिड़ककर उसे बुझा दिया। कृष्ण ने शिव पर जृंभास्त्र का प्रयोग किया। शिव की जृंभा से ज्वाला निकलकर दिशाओं को दग्ध करने लगी। पृथ्वी भयभीत होकर ब्रह्मा की शरण में गयी। ब्रह्मा ने शिव से कहा-'विष्णु और तुम अभिन्न हो। एक ही के दो रूप हो। तुम्हारी सलाह से ही असुरों का नाश आरंभ किया गया था। अब तुम असुरों को प्रश्रय क्यों दे रहे हो?' शिव ने योग बल से अपना और विष्णु का एकत्व जाना, अत: पृथ्वी पर विष्णु से युद्ध करने का निश्चय कर लिया। बाणासुर तथा कृष्ण का युद्ध हुआ। बाणासुर को बचाने के लिए पार्वती दोनों के मध्य जा खड़ी हुईं। वे मात्र कृष्ण को नग्न रूप में दीख पड़ रही थीं, शेष सबके लिए अदृश्य थीं। कृष्ण ने आंखे मूंद ली। देवी की प्रार्थना पर कृष्ण ने बाणासुर को जीवित रहने दिया किंतु उसके मद को नष्ट करने के लिए एक सहस्त्र हाथों में से दो को छोड़कर शेष काट डाले। शिव ने बीच-बचाव किया। पुत्रवत बाणासुर को शिव ने चार वर प्रदान किये-

अजर-अमरत्व,
शिव-भक्ति में विभोर नाचने वालों को पुत्र-प्राप्ति,
बांहे कटने के कष्ट से मुक्ति तथा
महाकाल नाम की ख्याति।

अत: बाणासुर महाकाल कहलाने लगा।

भस्मासुर

हिन्दू पौराणिक कथाओं में वर्णित एक ऐसा राक्षस था जिसे वरदान था कि वो जिसके सिर पर हाथ रखेगा, वह भस्म हो जाएगा। कथा के अनुसार भस्मासुर ने इस शक्ति का गलत प्रयोग शुरू किया और स्वयं शिव जी को भस्म करने चला। शिव जी ने विष्णु जी से सहायता माँगी। विष्णु जी ने एक सुन्दर स्त्री का रूप धारण किया, भस्मासुर को आकर्षित किया और नृत्य के लिए प्रेरित किया। नृत्य करते समय भस्मासुर विष्णु जी की ही तरह नृत्य करने लगा और उचित मौका देखकर विष्णु जी ने अपने सिर पर हाथ रखा, जिसकी नकल शक्ति और काम के नशे में चूर भस्मासुर ने भी की। भस्मासुर अपने ही वरदान से भस्म हो गया।

बकासुर

पांचों पांडव तथा कुंती कौरवों से बचने के लिए एकचक्रा नामक नगरी में, छद्मवेश में एक ब्राह्मण के घर रहने लगे। वे लोग भिक्षा मांगकर अपना निर्वाह करते थे। उस नगरी के पास बक नामक एक असुर रहता था। एकचक्रा नगरी का शासक दुर्बल था, अत: वहां बकासुर का आतंक छा गया था। बकासुर शत्रुओं तथा हिंसक प्राणियों से नगरी की सुरक्षा करता था। तथा फलस्वरूप नगरवासियों ने यह नियत कर दिया था कि वहां के निवासी गृहस्थ बारी-बारी से उसके एक दिन के भोजन का प्रबंध करेंगे। बकासुर नरभक्षी था। उसको प्रतिदिन बीस खारी अगहनी के चावल, दो भैंसे तथा एक मनुष्य को आवश्यकता होती थी। उस दिन पांडवों के आश्रयदाता ब्राह्मण की बारी थी। उसके परिवार में पति-पत्नी, एक पुत्र तथा एक पुत्री थे। वे लोग निश्चय नहीं कर पा रहे थे कि किसको बकासुर के पास भेजा जाय। कुंती की प्रेरणा से ब्राह्मण के स्थान पर खाद्य सामग्री लेकर भीमसेन बकासुर के पास गया। पहले तो वह बक को चिढ़ाकर उसके लिए आयी हुई खाद्य सामग्री खाता रहा, फिर उससे द्वंद्व युद्ध कर भीम ने उसे मार डाला। भीमसेन ने उसके परिवारजनों से कहा कि वे लोग नर-मांस का परित्याग कर देंगे तो भीम उनको नहीं मारेगा। उन्होंने स्वीकार कर लिया। पांडवों ने उस ब्राह्मण से प्रतिज्ञा ले ली कि वह किसी पर यह प्रकट नहीं होने देगा कि बकासुर को भीमसेन ने मारा है।

बालसखाओं के साथ बलराम और कृष्ण जलाशय के तट पर पहुंचे। तट पर पर्वतवत एक बड़ा बगुला बैठा था। वह कंस का मित्र था। उसने कृष्ण को निगल लिया। उसके तालू में कृष्ण ने ऐसी जलन उत्पन्न की कि उसने तुरंत उसे उगल भी दिया। फिर चोंच से कठिन प्रहार करना ही चाहता था कि कृष्ण ने चोंच पकड़कर उसे चीर डाला। उसका संसार से उद्धार हो गया। वह बक नामक असुर था जो बगुले का रूप धर कर वहां गया था।

चन्दा
धेनुका

धेनुकासुर का वध करते कृष्ण और बलराम धेनुकासुर अथवा धेनुका महाभारतकालीन एक असुर था, जिसका वध बलराम ने अपनी बाल अवस्था में किया था। जब कृष्ण तथा बलराम अपने सखाओं के साथ ताड़ के वन में फलों को खाने गये, तब असुर धेनुकासुर ने गधे के रूप में उन पर हमला किया। बलराम ने उसके पैर पकड़कर और घुमाकर पेड़ पर पटक दिया, जिससे प्राण निकल गये। कथा वृंदावन में रहते हुए बलराम और श्रीकृष्ण ने पौगण्ड-अवस्था में अर्थात छठे वर्ष में प्रवेश कर लिया था। बलराम और श्रीकृष्ण के सखाओं में एक प्रधान गोप बालक थे, जिनका नाम था- श्रीदामा। एक दिन उन्होंने बड़े प्रेम से बलराम और श्रीकृष्ण से कहा- "हम लोगों को सर्वदा सुख पहुँचाने वाले बलरामजी। आपके बाहुबल की तो कोई थाह ही नहीं है। हमारे मनमोहन श्रीकृष्ण! दुष्टों को नष्ट कर डालना तो तुम्हारा स्वभाव ही है। यहाँ से थोड़ी ही दूर पर एक बड़ा भारी वन है। उसमें बहुत सारे ताड़ के वृक्ष हैं। वे सदा फलों से लदे रहते हैं। वहाँ धेनुक नाम का दुष्ट दैत्य भी रहता है। उसने उन फलों को खाने पर रोक लगा रखी है। वह दैत्य गधे के रूप में रहता है। है श्रीकृष्ण! हमें उन फलों को खाने की बड़ी इच्छा है।" अपने सखा ग्वाल बालों की यह बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम दोनों हंसे और फिर उन्हें प्रसन्न करने के लिए उनके साथ ताड़ वन के लिए चल पड़े। धेनुकासुर का वध वन में पहुँचकर बलराम ने अपनी बांहों से उन ताड़ के पेड़ों को पकड़ लिया और बड़े जोर से हिलाकर बहुत से फल नीचे गिरा दिए। जब गधे के रूप में रहने वाले दैत्य धेनुकासुर ने फलों के गिरने का शब्द सुना, तब वह बलराम की ओर दौड़ा। बलराम ने अपने एक ही हाथ से उसके दोनों पैर पकड़ लिए और उसे आकाश में घुमाकर एक ताड़ के पेड़ पर दे मारा। घुमाते समय ही उस गधे के प्राण पखेरू उड़ गए। उसकी इस गति को देखकर उसके भाई-बंधु अनेकों गदहे वहाँ पहुंचे। बलराम तथा कृष्ण ने सभी को मार डाला।[1] जिस प्रकार बलराम ने धेनुकासुर को मारा, ग्वालबाल बलराम के बल की प्रशंसा करते नहीं थकते थे। धेनुकासुर वह है, जो भक्तों को भक्ति के वन में भी आनंद के मीठे फल नहीं खाने देता। बलराम बल और शौर्य के प्रतीक हैं। जब कृष्ण हृदय में हों तो बलराम के बिना अधूरे हैं। बलराम ही भक्ति के आनंद को बढ़ाने वाले हैं। ग्वालबाल अब मीठे फल भी खा रहे हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण का उल्लेख 'श्रीमद्भागवत महापुराण'[2] के अनुसार- श्रीशुकदेवजी कहते हैं- "परीक्षित! अब बलराम और श्रीकृष्ण ने पौगण्ड-अवस्था में अर्थात् छठे वर्ष में प्रवेश किया था। अब उन्हें गौएँ चराने की स्वीकृति मिल गयी। वे अपने सखा ग्वालबालों के साथ गौएँ चराते हुए वृन्दावन में जाते और अपने चरणों से वृन्दावन को अत्यन्त पावन करते। यह वन गौओं एक लिये हरी-हरी घास से युक्त एवं रंग-बिरंगे पुष्पों की खान हो रहा था। आगे-आगे गौएँ, उनके पीछे-पीछे बाँसुरी बजाते हुए श्यामसुन्दर, तदनन्तर बलराम और फिर श्रीकृष्ण के यश का गान करते हुए ग्वालबाल, इस प्रकार विहार करने के लिये उन्होंने उस वन में प्रवेश किया। उस वन में कहीं तो भौरें बड़ी मधुर गुंजार कर रहे थे, कहीं झुंड-के-झुंड हिरन चौकड़ी भर रहे थे और कहीं सुन्दर-सुन्दर पक्षी चहक रहे थे। बड़े ही सुन्दर-सुन्दर सरोवर थे, जिनका जल महात्माओं के हृदय के समान स्वच्छ और निर्मल था। उनमें खिले हुए कमलों के सौरभ से सुवासित होकर शीतल-मन्द-सुगन्ध वायु उस वन की सेवा कर रही थी। इतना मनोहर था वह वन कि उसे देखकर भगवान ने मन-ही-मन उसमें विहार करने का संकल्प किया। पुरुषोत्तम भगवान ने देखा कि बड़े-बड़े वृक्ष फल और फूलों के भार से झुककर अपनी डालियों और नूतन कोंपलों की लालिमा से उनके चरणों का स्पर्श कर रहे हैं, तब उन्होंने बड़े आनन्द से कुछ मुसकाते हुए-से अपने बड़े भाई बलरामजी से कहा। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- "देवशिरोमणे! यों तो बड़े-बड़े देवता आपके चरणकमलों की पूजा करते है; परन्तु देखिये तो, ये वृक्ष भी अपनी डालियों से सुन्दर पुष्प और फलों की सामग्री लेकर आपके चरणकमलों में झुक रहे हैं, नमस्कार कर रहें हैं। क्यों न हो, इन्होंने इसी सौभाग्य के लिये तथा अपना दर्शन एवं श्रवण करने वालों के अज्ञान का नाश करने के लिये ही तो वृन्दावनधाम में वृक्ष-योनि ग्रहण की है। इनका जीवन धन्य है। आदिपुरुष! यद्यपि आप इस वृन्दावन में अपने ऐश्वर्यरूप को छिपाकर बालकों की-सी लीला कर रहें हैं, फिर भी आप आपके श्रेष्ठ भक्त मुनिगण अपने इष्टदेव को पहचानकर यहाँ भी प्रायः भौरों के रूप में आपके भुवन-पावन यश का निरन्तर गान करते हुए आपके भजन में लगे रहते हैं। वे एक क्षण के लिये भी आपको नहीं छोड़ना चाहते। भाईजी! वास्तव में आप ही स्तुति करने योग्य हैं। देखिये, आपको अपने घर आया देख ये मोर आपके दर्शनों से आनन्दित होकर नाच रहे हैं। हिरनियाँ मृगनयनी गोपियों के समान अपनी प्रेमभरी तिरछी चितवन से आपके प्रति प्रेम प्रकट कर रही हैं, आपको प्रसन्न कर रही हैं। ये कोयलें अपनी मधुर कुहू-कुहू ध्वनि से आपका कितना सुन्दर स्वागत कर रही हैं। वे वनवासी होने पर भी धन्य हैं। क्योंकि सत्पुरुषों का स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे घर आये अतिथि को अपनी प्रिय-से-प्रिय वस्तु भेँट कर देंते हैं। आज यहाँ की भूमि अपनी हरी-हरी घास के साथ आपके चरणों का स्पर्श प्राप्त करके धन्य हो रही है। यहाँ के वृक्ष, लताएँ और झाड़ियाँ आपकी अँगुलियों का स्पर्श पाकर अपना अहोभाग्य मान रही हैं। आपकी दया भरी चितवन से नदी, पर्वत, पशु, पक्षी-सब कृतार्थ हो रहे हैं और ब्रज की गोपियाँ आपके वक्षःस्थल का स्पर्श प्राप्त करके, जिसके लिये स्वयं लक्ष्मी भी लालायित रहती हैं, धन्य-धन्य हो रही हैं।" श्रीशुकदेवजी कहते हैं- "परीक्षित! इस प्रकार परम सुन्दर वृन्दावन को देखकर भगवान श्रीकृष्ण बहुत ही आनन्दित हुए। वे अपने सखा ग्वालबालों के साथ गोवर्धन की तराई में, यमुना के तट पर गौओं को चराते हुए अनेकों प्रकार की लीलायें करने लगे। बलरामजी और श्रीकृष्ण के सखाओं में एक प्रधान गोप-बालक थे 'श्रीदामा'। एक दिन उन्होंने तथा सुबल और स्तोककृष्ण (छोटे कृष्ण) आदि ग्वालबालों ने श्याम और राम से बड़े प्रेम के साथ कहा- "हम लोगों को सर्वदा सुख पहुँचाने वाले बलरामजी! आपके बाहुबल की तो कोई थाह ही नहीं है। हमारे मनमोहन श्रीकृष्ण! दुष्टों को नष्ट कर डालना तो तुम्हारा स्वाभाव ही है। यहाँ से थोड़ी ही दूर पर एक बड़ा भारी वन है। बस, उसमें पाँत-के-पाँत ताड़ के वृक्ष भरे पड़े हैं। वहाँ बहुत-से ताड़ के फल पक-पकाकर गिरते रहते हैं और बहुत-से पहले के गिरे हुए भी हैं। परन्तु वहाँ धेनुक नाम का एक दुष्ट दैत्य रहता है। उसने उन फलों पर रोक लगा रखी है। बलरामजी और भैया श्रीकृष्ण! वह दैत्य गधे के रूप में रहता है। वह स्वयं तो बड़ा बलवान है ही, उसके साथी और भी बहुत-से उसी के समान बलवान दैत्य उसी रूप में रहते हैं। मेरे शत्रुघाती भैया! उस दैत्य ने अब तक न जाने कितने मनुष्य खा डाले हैं! यही कारण है कि उसके डर के मारे मनुष्य उसका सेवन नहीं करते और पशु-पक्षी भी उस जंगल में नहीं जाते। उसके फल हैं तो बड़े सुगन्धित, परन्तु हमने कभी नहीं खाये। देखो न, चारों ओर उन्हीं की मन्द-मन्द सुगन्ध फ़ैल रही है। तनिक-सा ध्यान देने से उसका रस मिलने लगता है। श्रीकृष्ण! उनकी सुगन्ध से हमारा मन मोहित हो गया है और उन्हें पाने के लिये मचल रहा है। तुम हमें वे फल अवश्य खिलाओ। दाऊ दादा! हमें उन फलों की बड़ी उत्कट अभिलाषा है। आपको रुचे तो वहाँ अवश्य चलिये।" अपने सखा ग्वालबालों की यह बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम दोनों हँसे और फिर उन्हें प्रसन्न करने के लिये उनके साथ तालवन के लिये चल पड़े। उस वन में पहुँचकर बलरामजी ने अपनी बाँहों से उन ताड़ के पेड़ों को पकड़ लिया और मतवाले हाथी के बच्चे के समान उन्हें बड़े जोर से हिलाकर बहुत-से फल नीचे गिरा दिये। जब गधे के रूप में रहने वाले दैत्य ने फलों के गिरने का शब्द सुना, तब वह पर्वतों के साथ सारी पृथ्वी को कँपाता हुआ उनकी ओर दौड़ा। वह बड़ा बलवान था। उसने बड़े वेग से बलरामजी के सामने आकर अपने पिछले पैरों से उनकी छाती में दुलत्ती मारी और इसके बाद वह दुष्ट बड़े जोर से रेंकता हुआ वहाँ से हट गया। राजन! वह गधा क्रोध में भरकर फिर रेंकता हुआ दूसरी बार बलरामजी के पास पहुँचा और उनकी ओर पीठ करके फिर बड़े क्रोध में अपने पिछले पैरों की दुलत्ती चलायी। बलरामजी ने अपने एक ही हाथ से उसके दोनों पैर पकड़ लिये और उसे आकाश में घुमाकर एक ताड़ के पेड़ पर दे मारा। घुमाते समय उस गधे के प्राण पखेरू उड़ गये थे। उसके गिरने की चोट से वह महान ताड़ का वृक्ष, जिसका ऊपरी भाग बहुत विशाल था, स्वयं तो तड़तड़ाकर गिर ही पड़ा, सटे हुए दूसरे वृक्ष को भी उसने तोड़ डाला। उसने तीसरे को, तीसरे ने चौथे को-इस प्रकार एक-दूसरे को गिराते हुए बहुत-से तालवृक्ष गिर पड़े। बलरामजी के लिये तो यह एक खेल था। परन्तु उनके द्वारा फेंके हुए गधे के शरीर से चोट खा-खाकर वहाँ सब-के-सब ताड़ हिल गये। ऐसा जान पड़ा, मानो सबको झंझावात ने झकझोर दिया हो। भगवान बलराम स्वयं जगदीश्वर हैं। उनमें यह सारा संसार ठीक वैसे ही ओत-प्रोत है, जैसे सूतों में वस्त्र। तब भला, उनके लिये यह कौन आश्चर्य की बात है। उस समय धेनुकासुर के भाई-बन्धु अपने भाई के मारे जाने से क्रोध के मारे आगबबूला हो गये। सब-के-सब गधे बलरामजी और श्रीकृष्ण पर बड़े वेग से टूट पड़े। राजन! उनमें से जो-जो पास आया, उसी-उसी को बलरामजी और श्रीकृष्ण ने खेल-खेल में ही पिछले पैर पकड़कर तालवृक्षों पर दे मारा। उस समय वह भूमि ताड़ के फलों से पट गयी और टूटे हुए वृक्ष तथा दैत्यों के प्राणहीन शरीरों से भर गयी। जैसे बादलों से आकाश ढक गया हो, उस भूमि की वैसी ही शोभा होने लगी। बलरामजी और श्रीकृष्ण की यह मंगलमयी लीला देखकर देवतागण उन पर फूल बरसाने लगे और बाजे बजा-बजाकर स्तुति करने लगे। जिस दिन धेनुकासुर मरा, उसी दिन से लोग निडर होकर उस वन के तालफल खाने लगे तथा पशु भी स्वच्छन्दता के साथ घास चरने लगे। इसके बाद कमलदल लोचन भगवान श्रीकृष्ण बड़े भाई बलरामजी के साथ ब्रज में आये। उस समय उनके साथी ग्वालबाल उनके पीछे-पीछे चलते हुए उनकी स्तुति करते जाते थे। क्यों न हो; भगवान की लीलाओं का श्रवण-कीर्तन ही सबसे बढ़कर पवित्र जो है। उस समय श्रीकृष्ण की घुँघराली अलकों पर गौओं के खुरों से उड़-उड़कर धूलि पड़ी हुई थी, सिर पर मोरपंख का मुकुट था और बालों में सुन्दर-सुन्दर जंगली पुष्प गुँथे हुए थे। उनके नेत्रों में मधुर चितवन और मुख पर मनोहर मुस्कान थी। वे मधुर-मधुर बाँसुरी बजा रहे थे और साथी ग्वालबाल उनकी ललित कीर्ति का गान कर रहे थे। वंशी की ध्वनि सुनकर बहुत-सी गोपियाँ एक साथ ही ब्रज से बाहर निकल आयीं। उनकी आँखें न जाने कब से श्रीकृष्ण के दर्शन के लिये तरस रही थीं। गोपियों ने अपने नेत्ररूप भ्रमरों से भगवान के मुखारविन्द का मकरन्द-रस पान करके दिन-भर के विरह की जलन शान्त की और भगवान ने भी उनकी लाजभरी हँसी तथा विनय से युक्त प्रेम भरी तिरछी चितवन का सत्कार स्वीकार करके ब्रज में प्रवेश किया। उधर यशोदा मैया और रोहिणी का हृदय वात्सल्य स्नेह से उमड़ रहा था। उन्होंने श्याम और राम के घर पहुँचते ही उनकी इच्छा के अनुसार तथा समय के अनुरूप पहले से ही सोच-सँजोकर रखी हुई वस्तुएँ उन्हें खिलायीं-पिलायीं और पहनायीं। माताओं ने तेल-उबटन आदि लगाकर स्नान कराया। इससे उनकी दिनभर घूमने-फिरने की मार्ग की थकान दूर हो गयी। फिर उन्होंने सुन्दर वस्त्र पहनाकर दिव्य पुष्पों की माला पहनायी तथा चन्दन लगाया तत्पश्चात दोनों भाइयों ने माताओं का परोसा हुआ स्वादिष्ट अन्न भोजन किया। उसके बाद बड़े लाड़-प्यार से दुलार-दुलार कर यशोदा और रोहिणी ने उन्हें सुन्दर शय्या पर सुलाया। श्याम और राम बड़े आराम से सो गये।

खर-दूषण
मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से

Seeing the plight of Shurpanakhi, the enraged demon army of Khara and Dushana came and attacked Rama. Single handedly, Rama destroyed the complete force of demons.

खर-दूषण रामायण के दुष्ट पात्र हैं। खर और दूषण दोनों ही रावण के भाई थे। खर-दूषण को राम ने मारा था.

हिरण्यकशिपु
मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
(हिरण्यकश्यपु से अनुप्रेषित)

भगवान नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु का वध
हिरण्यकशिपु एक असुर था जिसकी कथा पुराणों में आती है। उसका वध नृसिंह अवतारी विष्णु द्वारा किया गया। हिरण्याक्ष उसका छोटा भाई था जिसका वध वाराह ने किया था।

विष्णुपुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार दैत्यों के आदिपुरुष कश्यप और उनकी पत्नी दिति के दो पुत्र हुए। हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष। हिरण्यकशिपु ने कठिन तपस्या द्वारा ब्रह्मा को प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त कर लिया कि न वह किसी मनुष्य द्वारा मारा जा सकेगा न पशु द्वारा, न दिन में मारा जा सकेगा न रात में, न घर के अंदर न बाहर, न किसी अस्त्र के प्रहार से और न किसी शस्त्र के प्रहार से उसक प्राणों को कोई डर रहेगा। इस वरदान ने उसे अहंकारी बना दिया और वह अपने को अमर समझने लगा। उसने इंद्र का राज्य छीन लिया और तीनों लोकों को प्रताड़ित करने लगा। वह चाहता था कि सब लोग उसे ही भगवान मानें और उसकी पूजा करें। उसने अपने राज्य में विष्णु की पूजा को वर्जित कर दिया। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद, भगवान विष्णु का उपासक था और यातना एवं प्रताड़ना के बावजूद वह विष्णु की पूजा करता रहा। क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर प्रज्ज्वलित अग्नि में चली जाय क्योंकि होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। जब होलिका ने प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश किया तो प्रह्लाद का बाल भी बाँका न हुआ पर होलिका जलकर राख हो गई। अंतिम प्रयास में हिरण्यकशिपु ने लोहे के एक खंभे को गर्म कर लाल कर दिया तथा प्रह्लाद को उसे गले लगाने को कहा। एक बार फिर भगवान विष्णु प्रह्लाद को उबारने आए। वे खंभे से नरसिंह के रूप में प्रकट हुए तथा हिरण्यकशिपु को महल के प्रवेशद्वार की चौखट पर, जो न घर का बाहर था न भीतर, गोधूलि बेला में, जब न दिन था न रात, आधा मनुष्य, आधा पशु जो न नर था न पशु ऐसे नरसिंह के रूप में अपने लंबे तेज़ नाखूनों से जो न अस्त्र थे न शस्त्र, मार डाला। इस प्रकार हिरण्यकश्यप अनेक वरदानों के बावजूद अपने दुष्कर्मों के कारण भयानक अंत को प्राप्त हुआ।

हिरण्यकशिपु उत्तर प्रदेशा के हरदोई जिले में हुआ था। हिरण्यकश्यपु हरदोई जिले का राजा था। उसके किले के कुछ अवशोष अभी भी है।

हिरण्यकशिपु के नाम के विषय में मतभेद है। कुछ स्थानों पर उसे हिरण्यकश्यप कहा गया है और कुछ स्थानों पर हिरण्यकशिपु। ऐसा माना जाता है कि संभवतः जन्म के समय उसका नाम हिरण्यकश्यप रखा गया किंतु सबको प्रताड़ित करने के कारण (संस्कृत में कषि का अर्थ है हानिकारक, अनिष्टकर, पीड़ाकारक) उसको बाद में हिरण्यकशिपु नाम से जाना गया। नाम पर जो भी मतभेद हों, उसकी मौत बिहार के पूर्णिया जिले के बनमनखी प्रखंड के जानकीनगर के पास धरहरा में हुआ था। इसका प्रमाण अभी भी यहाँ है और प्रतिवर्ष लाखो लोग यहाँ होलिका दहन में भाग लेते है।

हिरण्याक्ष

हिरण्याक्ष : हिरण्याक्ष भयंकर दैत्य था। वह तीनों लोकों पर अपना अधिकार चाहता था। हिरण्याक्ष का दक्षिण भारत पर राज था। ब्रह्मा से युद्ध में अजेय और अमरता का वर मिलने के कारण उसका धरती पर आतंक हो चला था। हिरण्याक्ष भगवान वराहरूपी विष्णु के पीछे लग गया था और वह उनके धरती निर्माण के कार्य की खिल्ली उड़ाकर उनको युद्ध के लिए ललकारता था। वराह भगवान ने जब रसातल से बाहर निकलकर धरती को समुद्र के ऊपर स्थापित कर दिया, तब उनका ध्यान हिरण्याक्ष पर गया।

आदि वराह के साथ भी महाप्रबल वराह सेना थी। उन्होंने अपनी सेना को लेकर हिरण्याक्ष के क्षे‍त्र पर चढ़ाई कर दी और विंध्यगिरि के पाद प्रसूत जल समुद्र को पार कर उन्होंने हिरण्याक्ष के नगर को घेर लिया। संगमनेर में महासंग्राम हुआ और अंतत: हिरण्याक्ष का अंत हुआ। आज भी दक्षिण भारत में हिंगोली, हिंगनघाट, हींगना नदी तथा हिरण्याक्षगण हैंगड़े नामों से कई स्थान हैं। उल्लेखनीय है कि सबसे पहले भगवान विष्णु ने नील वराह का अवतार लिया फिर आदि वराह बनकर हिरण्याक्ष का वध किया इसके बाद श्‍वेत वराह का अवतार नृसिंह अवतार के बाद लिया था। हिरण्याक्ष को मारने के बाद ही स्वायंभूव मनु को धरती का साम्राज्य मिला था।

एक बार मरीचि नन्दन कश्यप जी ने भगवान को प्रसन्न करने के लिये खीर की आहुति दिया और उनकी आराधना समाप्त करके सन्ध्या काल के समय अग्निशाला में ध्यानस्थ होकर बैठे गये। उसी समय दक्ष प्रजापति की पुत्री दिति (यह कश्यप की पत्नी तथा राक्षसों की माता है।) कामातुर होकर पुत्र प्राप्ति की लालसा से कश्यप जी के निकट गई। दिति ने कश्यप जी से मीठे वचनों से अपने साथ रमण करने के लिये प्रार्थना किया। इस पर कश्यप जी ने कहा, "हे प्रिये! मैं तुम्हें तुम्हारी इच्छानुसार तेजस्वी पुत्र अवश्य दूँगा। किन्तु तुम्हें एक प्रहर के लिये प्रतीक्षा करनी होगी। सन्ध्या काल में सूर्यास्त के पश्चात् भूतनाथ भगवान शंकर अपने भूत, प्रेत तथा यक्षों को लेकर बैल पर चढ़ कर विचरते हैं। इस समय तुम्हें कामक्रीड़ा में रत देख कर वे अप्रसन्न हो जावेंगे। अतः यह समय सन्तानोत्पत्ति के लिये उचित नहीं है। सारा संसार मेरी निन्दा करेगा। यह समय तो सन्ध्यावन्दन और भगवत् पूजन आदि के लिये ही है। इस समय जो पिशाचों जैसा आचरण करते हैं वे नरकगामी होते हैं।"

पति के इस प्रकार समझाने पर भी उसे कुछ भी समझ में न आया और उस कामातुर दिति ने निर्लज्ज भाव से कश्यप जी के वस्त्र पकड़ लिये। इस पर कश्यप जी ने दैव इच्छा को प्रबल समझ कर दैव को नमस्कार किया और दिति की इच्छा पूर्ण की और उसके बाद शुद्ध जल से स्नान कर के सनातन ब्रह्म रूप गायत्री का जप करने लगे। दिति ने गर्भ धारण कर के कश्यप जी से प्रार्थना की, "हे आर्यपुत्र! भगवान भूतनाथ मेरे अपराध को क्षमा करें और मेरा यह गर्भ नष्ट न करें। उनका स्वभाव बड़ा उग्र है। किन्तु वे अपने भक्तों की सदा रक्षा करते हैं। वे मेरे बहनोई हैं मैं उन्हें नमस्कार करती हूँ।"

कश्यप जब सन्ध्यावन्दन आदि से निवृत हुये तो उन्होंने अपनी पत्नी को अपनी सन्तान के हित के लिये प्रार्थना करते हुये और थर थर काँपती हुई देखा तो वे बोले, "हे दिति! तुमने मेरी बात नहीं मानी। तुम्हारा चित्त काम वासना में लिप्त था। तुमने असमय में भोग किया है। तुम्हारे कोख से महा भयंकर अमंगलकारी दो अधम पुत्र उत्पन्न होंगे। सम्पूर्ण लोकों के निरपराध प्राणियों को अपने अत्याचारों से कष्ट देंगे। धर्म का नाश करेंगे। साधू और स्त्रियों को सतायेंगे। उनके पापों का घड़ा भर जाने पर भगवान कुपित हो कर उनका वध करेंगे।"

दिति ने कहा, "हे भगवन्! मेरी भी यही इच्छा है कि मेरे पुत्रों का वध भगवान के हाथ से ही हो। ब्राह्मण के शाप से न हो क्योंकि ब्राह्मण के शाप के द्वारा प्राणी नरक में जाकर जन्म धारण करता है।" तब कश्यप जी बोले, "हे देवि! तुम्हें अपने कर्म का अति पश्चाताप है इस लिये तुम्हारा नाती भगवान का बहुत बड़ा भक्त होगा और तुम्हारे यश को उज्वल करेगा। वह बालक साधुजनों की सेवा करेगा और काल को जीत कर भगवान का पार्षद बनेगा।"

कश्यप जी के मुख से भगवद्भक्त पौत्र के उत्पन्न होने की बात सुन कर दिति को अति प्रसन्नता हुई और अपने पुत्रों का वध साक्षात् भगवान से सुन कर उस का सारा खेद समाप्त हो गया।

उसके दो पुत्र हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकश्यपु का जन्म हुआ और विधि के विधानों के हिसाब से ये दुष्टता की राह पर चल पड़े। ये तथा इनके वंश राक्षस कहलाए परंतु प्रभु की इच्छा से इनके कुल में प्रहलाद और बलि जैसे महापुरुषों का जन्म भी हुआ।

जय और विजय

एक बार सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार (ये चारों सनकादि ऋषि कहलाते हैं और देवताओं के पूर्वज माने जाते हैं) सम्पूर्ण लोकों से विरक्त होकर चित्त की शान्ति के लिये भगवान विष्णु के दर्शन करने हेतु उनके बैकुण्ठ लोक में गये। बैकुण्ठ के द्वार पर जय और विजय नाम के दो द्वारपाल पहरा दिया करते थे। जय और विजय ने इन सनकादिक ऋषियों को द्वार पर ही रोक लिया और बैकुण्ठ लोक के भीतर जाने से मना करने लगे।

उनके इस प्रकार मना करने पर सनकादिक ऋषियों ने कहा, "अरे मूर्खों! हम तो भगवान विष्णु के परम भक्त हैं। हमारी गति कहीं भी नहीं रुकती है। हम देवाधिदेव के दर्शन करना चाहते हैं। तुम हमें उनके दर्शनों से क्यों रोकते हो? तुम लोग तो भगवान की सेवा में रहते हो, तुम्हें तो उन्हीं के समान समदर्शी होना चाहिये। भगवान का स्वभाव परम शान्तिमय है, तुम्हारा स्वभाव भी वैसा ही होना चाहिये। हमें भगवान विष्णु के दर्शन के लिये जाने दो।" ऋषियों के इस प्रकार कहने पर भी जय और विजय उन्हें बैकुण्ठ के अन्दर जाने से रोकने लगे। जय और विजय के इस प्रकार रोकने पर सनकादिक ऋषियों ने क्रुद्ध होकर कहा, "भगवान विष्णु के समीप रहने के बाद भी तुम लोगों में अहंकार आ गया है और अहंकारी का वास बैकुण्ठ में नहीं हो सकता। इसलिये हम तुम्हें शाप देते हैं कि तुम लोग पापयोनि में जाओ और अपने पाप का फल भुगतो।" उनके इस प्रकार शाप देने पर जय और विजय भयभीत होकर उनके चरणों में गिर पड़े और क्षमा माँगने लगे।

यह जान कर कि सनकादिक ऋषिगण भेंट करने आये हैं भगवान विष्णु स्वयं लक्ष्मी जी एवं अपने समस्त पार्षदों के साथ उनके स्वागत के लिय पधारे। भगवान विष्णु ने उनसे कहा, "हे मुनीश्वरों! ये जय और विजय नाम के मेरे पार्षद हैं। इन दोनों ने अहंकार बुद्धि को धारण कर आपका अपमान करके अपराध किया है। आप लोग मेरे प्रिय भक्त हैं और इन्होंने आपकी अवज्ञा करके मेरी भी अवज्ञा की है। इनको शाप देकर आपने उत्तम कार्य किया है। इन अनुचरों ने ब्रह्मणों का तिरस्कार किया है और उसे मैं अपना ही तिरस्कार मानता हूँ। मैं इन पार्षदों की ओर से क्षमा याचना करता हूँ। सेवकों का अपराध होने पर भी संसार स्वामी का ही अपराध मानता है। अतः मैं आप लोगों की प्रसन्नता की भिक्षा चाहता हूँ।"

भगवान के इन मधुर वचनों से सनकादिक ऋषियों का क्रोध तत्काल शान्त हो गया। भगवान की इस उदारता से वे अति अनन्दित हुये और बोले, "आप धर्म की मर्यादा रखने के लिये ही ब्राह्मणों को इतना आदर देते हैं। हे नाथ! हमने इन निरपराध पार्षदों को क्रोध के वश में होकर शाप दे दिया है इसके लिये हम क्षमा चाहते हैं। आप उचित समझें तो इन द्वारपालों को क्षमा करके हमारे शाप से मुक्त कर सकते हैं।"

भगवान विष्णु ने कहा, "हे मुनिगणों! मै सर्वशक्तिमान होने के बाद भी ब्राह्मणों के वचन को असत्य नहीं करना चाहता क्योंकि इससे धर्म का उल्लंघन होता है। आपने जो शाप दिया है वह मेरी ही प्रेरणा से हुआ है। ये अवश्य ही इस दण्ड के भागी हैं। ये दिति के गर्भ में जाकर दैत्य योनि को प्राप्त करेंगे और मेरे द्वारा इनका संहार होगा। ये मुझसे शत्रुभाव रखते हुये भी मेरे ही ध्यान में लीन रहेंगे। मेरे द्वारा इनका संहार होने के बाद ये पुनः इस धाम में वापस आ जावेंगे।"

हिरण्याक्ष वध

जय और विजय बैकुण्ठ से गिर कर दिति के गर्भ में आ गये। कुछ काल के पश्चात् दिति के गर्भ से दो पुत्र उत्पन्न हुये जिनका नाम प्रजापति कश्यप ने हिरण्यकश्यपु और हिरण्याक्ष रखा। इन दोनों यमल के उत्पन्न होने के समय तीनों लोकों में अनेक प्रकार के भयंकर उत्पात होने लगे। स्वर्ग पृथ्वी, आकाश सभी काँपने लगे और भयंकर आँधियाँ चलने लगीं। सूर्य और चन्द्र पर केतु और राहु बार बार बैठने लगे। उल्कापात होने लगे। बिजलियाँ गिरने लगीं। नदियों तथा जलशयों के जल सूख गये। गायों के स्तनों से रक्त बहने लगा। उल्लू, सियार आदि रोने लगे।



अपनी कोहनी पर भू देवी को उठाए हुए जल से बाहर आ रहे तथा सर्प पर खड़े वाराह भगवान का शिलाचित्र, दिल्ली संग्रहालय में।

दोनों दैत्य जन्मते ही आकाश तक बढ़ गये। उनका शरीर फौलाद के समान पर्वताकार हो गया। वे स्वर्ण के कवच, कुण्डल, कर्द्धनी, बाजूबन्द आदि पहने हुये थे। हिरण्यकश्यपु ने तप करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया। ब्रह्मा जी से उसने वरदान ले लिया कि उसकी मृत्यु न दिन में हो न रात में, न घर के भीतर हो न बाहर। इस तरह से अभय हो कर और तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर के वह एक छत्र राज्य करने लगा। उसका छोटा भाई हिरण्याक्ष उसकी आज्ञा का पलन करते हुये शत्रुओं का नाश करने लगा। एक दिन घूमते घूमते वह वरुण की पुरी में जा पहुँचा। पाताल लोक में पहुँच कर हिरण्याक्ष ने वरुण देव से युद्ध की याचना करते हुये कहा, "हे वरुण देव! आपने जगत के सम्पूर्ण दैत्यों तथा दानवों पर विजय प्राप्त किया है। मैं आपसे युद्ध की भिक्षा माँगता हूँ। आप मुझसे युद्ध करके अपने युद्ध कौशल का प्रमाण दें। उस दैत्य की बात सुन कर वरुण देव को क्रोध तो बहुत आया पर समय को देखते हुये उन्होंने हँसते हुये कहा, "अरे भाई! अब लड़ने का चाव नहीं रहा है और तुम जैसे बलशाली वीर से लड़ने के योग्य अब हम रह भी नहीं गये हैं। तुम को तो यज्ञपुरुष नारायण के पास जाना चाहिये। वे ही तुमसे लड़ने योग्य हैं।

वरुण देव की बात सुनकर उस दैत्य ने देवर्षि नारद के पास जाकर नारायण का पता पूछा। देवर्षि नारद ने उसे बताया कि नारायण इस समय वाराह का रूप धारण कर पृथ्वी को रसातल से निकालने के लिये गये हैं। इस पर हिरण्याक्ष रसातल में पहुँच गया। वहाँ उसने भगवान वाराह को अपने दाढ़ पर रख कर पृथ्वी को लाते हुये देखा। उस महाबली दैत्य ने वाराह भगवान से कहा, "अरे जंगली पशु! तू जल में कहाँ से आ गया है? मूर्ख पशु! तू इस पृथ्वी को कहाँ लिये जा रहा है? इसे तो ब्रह्मा जी ने हमें दे दिया है। रे अधम! तू मेरे रहते इस पृथ्वी को रसातल से नहीं ले जा सकता। तू दैत्य और दानवों का शत्रु है इसलिये आज मैं तेरा वध कर डालूँगा।"


उदयगिरि की गुफा, विदिष गुप्त साम्राज्य की प्राचीन राजधानी से मिला शिलाचित्र, भगवान वाराह भू देवी को दाँतों पर रखे हुए। एक प्रचीन शिलाचित्र जिसे पत्थर को काटकर अद्वितीय नक्काशीदार मुर्तिकला से बनाया गया था।

हिरण्याक्ष के इन वचनों को सुन कर वाराह भगवान को बहुर क्रोध आया किन्तु पृथ्वी को वहाँ छोड़ कर युद्ध करना उन्होंने उचित नहीं समझा और उनके कटु वचनों को सहन करते हुये वे गजराज के समान शीघ्र ही जल के बाहर आ गये। उनका पीछा करते हुये हिरण्याक्ष भी बाहर आया और कहने लगा, "रे कायर! तुझे भागने में लज्जा नहीं आती? आकर मुझसे युद्ध कर।" पृथ्वी को जल पर उचित स्थान पर रखकर और अपना उचित आधार प्रदान कर भगवान वाराह दैत्य की ओर मुड़े और कहा, "अरे ग्राम सिंह (कुत्ते)! हम तो जंगली पशु हैं और तुम जैसे ग्राम सिंहों को ही ढूँढते रहते हैं। अब तेरी मृत्यु सिर पर नाच रही है।" उनके इन व्यंग वचनों को सुनकर हिरण्याक्ष उन पर झपट पड़ा। भगवान वाराह और हिरण्याक्ष मे मध्य भयंकर युद्ध हुआ और अन्त में हिरण्याक्ष का भगवान वाराह के हाथों वध हो गया।

पशु रूप में वाराह, खजुराहो।

भगवान वाराह के विजय प्राप्त करते ही ब्रह्मा जी सहित समस्त देवतागण आकाश से पुष्प वर्षा कर उनकी स्तुति करने लगे।

भागवत पुराण के अनुसार-

ब्रह्मा नें मनु और सतरूपा का निर्माण किया और सृष्टि करने की आज्ञा दी। इसके लिये भूमि की आवश्यकता होती है जिसे हिरण्याक्ष नामक दैत्य लेकर सागर के भीतर भू देवी को अपना तकिया बना कर सोया था तथा देवताओं के डर से विष्ठा का घेरा बना रखा था।

मनु सतरूपा को जल ही जल दिखा जिसके बारे में ब्रह्मा को बताया तब ब्रह्मा ने सोचा कि सभी देव तो विष्ठा के पास तक नहीं जाते, एक शूकर ही है जो विष्ठा के समीप जा सकता है। भगवान विष्णु का ध्यान किया और अपने नासिका से वाराह नारायण को जन्म दिया, पृथ्वी को ऊपर लाने की आज्ञा दी।


भूमि देवी को लिये हुए भगवान वाराह का भित्ति चित्र।

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संवामुन्द
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नरकासुर 
एक राक्षस था, जिसका भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से संहार किया था। उसने 16 हजार लड़कियों को कैद कर रखा था। भगवान कृष्ण ने उसका संहार कर 16 हजार लड़कियों को कैद से आजाद करवाया था। इस उपलक्ष्य में दिवाली के एक दिन पहले 'नरक चतुर्दशी' मनाई जाती है।

कथा

प्रागज्योतिषपुर नगर का राजा नरकासुर नामक दैत्य था। उसने अपनी शक्ति से इंद्र, वरुण, अग्नि, वायु आदि सभी देवताओं को परेशान कर दिया। वह संतों को भी त्रास देने लगा। महिलाओं पर अत्याचार करने लगा। उसने संतों आदि की 16 हजार स्त्रीयों को भी बंदी बना लिया। जब उसका अत्याचार बहुत बढ़ गया तो देवता व ऋषिमुनि भगवान श्रीकृष्ण की शरण में गए। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें नराकासुर से मुक्ति दिलाने का आश्वसान दिया। लेकिन नरकासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया तथा उन्हीं की सहायता से नरकासुर का वध कर दिया।

इस प्रकार श्रीकृष्ण ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर देवताओं व संतों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। उसी की खुशी में दूसरे दिन अर्थात कार्तिक मास की अमावस्या को लोगों ने अपने घरों में दीए जलाए। तभी से नरक चतुर्दशी तथा दीपावली का त्योहार मनाया जाने लगा।

रक्तबीज
रक्तबीज की अवधारणा को समझने के लिए हमें पहले रक्तबीज को समझना होगा

जो भी मानवता के विरुद्ध हैं, वे ईश्वर के विरुद्ध हैं | जो अपनी मान्यताएँ थोपने के लिए दूसरों पर अत्याचार करते हैं, हिंसा करते हैं…. वे सभी दानव वंश के हैं और वे उसी रक्तबीज नामक असुर के अंश हैं जिसका वध करने के लिए माँ काली को आना पड़ा था…लेकिन वह असुर कभी मरा ही नहीं… आज भी धर्म के ठेकेदारों के अलग अलग रूप में वह सामने आता रहता है क्योंकि हम उसे महत्व देते हैं | यदि हम नफरत के बीज बोने वाले रक्तबीजों को महत्व देना बंद कर दें और उनका बहिष्कार करना शुरू कर दें तो वे स्वतः लुप्त हो जायेंगे | ~विशुद्ध चैतन्य

देवासुर संग्राम में रक्तबीज का प्रसंग आज भी प्रासंगिक लगता है.वह एक ऐसा शक्तिशाली राक्षस था,जिसके शरीर से खून की एक-एक बूँद गिरने पर उतने ही समरूप राक्षस (क्लोन)पैदा हो जाते थे.समझा जा सकता है कि उस से लड़ना कितना खतरनाक था. मारने के लिए तलवार,भाले,बरछे से प्रहार करो,काटो तो उसके रक्त की एक-एक बूँद गिरने से सैकड़ों,हजारों,लाखों,करोड़ों राक्षस पैदा हो जाते थे.यह कल्पना ही आश्चर्य,आशंका एवं भय पैदा कर देती है.उसे मारने के प्रयास न हों तो वह लगातार हजारों को खुद मारता रहे.मारो तो परेशानी, न मारो तो भी परेशानी.

वर्तमान में रक्तबीज नमक राक्षस तो बेशक स्वयं मौजूद नहीं है,किन्तु उसके प्रतीक,उसकी अवधारणा,उसका अभिशाप समाज में अस्तित्व बनाये हुए है.रक्तबीज की अवधारणा को समझने के लिए हमें पहले रक्तबीज को समझना होगा,उसके सम्पूर्ण अस्तित्व,व्यक्तित्व को जानना होगा..रक्तबीज एक असुर था-बुराई का प्रतीक.अत्यंत शक्तिशाली-शक्ति का प्रतीक.अत्यंत दुष्ट था-दुष्टता का प्रतीक..क्षण भर में कई गुना बढ़ जाने वाला, मारकर भी न मरने वाला,जितना काटो उतना अधिक फैलने वाला..न काटो तो भी सबको काटने वाला..तब के रक्तबीज की परिकल्पना आज के सन्दर्भ में मौजूद हर बुराई,बुराई के प्रतीक व्यक्ति,परंपरा,रिवाज,आचार-व्यवहार से कर सकते हैं.

आज हमारे सामाजिक,राजनैतिक,धार्मिक,आध्यात्मिक,आर्थिक क्षेत्रों में एक नहीं अनेक रक्तबीज पैदा होकर दिनों दिन कई गुना बढ़ते जा रहे हैं.इन्हें जितना नष्ट करने की कोशिश हो रही है,उतना ही कई गुना बढ़ते जा रहे हैं.भ्रष्टाचार,महंगाई,नशाखोरी,अनाचार,व्यभिचार,अत्याचार आदि ऐसे कई रक्तबीज के प्रतीक हैं,जो दिनों दिन कई गुना बढ़ रहे हैं.जितना इनका नाश करने की कोशिश होती है,उतना अधिक बढ़ जाते हैं.इन्हें समाप्त करने के प्रयास न हों तो ये समाज,देश,मानव,मानवता को नष्ट करते जा रहे हैं,उनके अस्तित्व के लिए खतरा बनते जा रहे हैं.इन बुराईयों को समाप्त करने की हर कोशिश नाकाम हो रही है.ये भी रक्तबीज की तरह हजारों-लाखों गुना बढ़कर अजर-अमर दिखाई देते हैं.अब संकट है कि इस समस्या का समाधान कैसे हो.रक्तबीज की प्रतीक इन बुराईयों का कैसे नाश हो?

देवासुर संग्राम के रक्तबीज का नाश करने के लिए माँ भगवती को महाकाली का रूप धारण करना पडा.रक्तबीज के रक्त को पीकर पुनः लाखों रक्तबीजों को पैदा होने से रोकना पडा.आज का समाज भी पूरी तरह से ल़ाचार हो चुका है.ये बुराईयाँ शक्तिशाली और व्यापक हो चुकी हैं.मनुष्य इनसे नहीं जीत पा रहा है.देवतुल्य आज का जनसामान्य इन बुराईयों से पीड़ित है.चाहकर भी इनका नाश नहीं कर पा रहा है.तब यदि माँ भगवती ने महाकाली का रूप धारण किया तो क्या आज भगवती स्वरूपा नारी शक्ति प्रचंड बल के साथ महाकाली के अस्तित्व का बोध नहीं करा सकेगी ? समाज,धर्म,राजनीति,मानव,मानवता को रक्तबीज के प्रतीक भ्रष्टाचार,महंगाई,नशाखोरी,अनाचार,व्यभिचार,अत्याचार जैसी बुराईयों से बचाने के लिए नारीशक्ति को काली का रूप धारण कर आगे आना ही होगा तथा इन्हें समूल नष्ट करना होगा.अन्यथा देश,समाज,मानव तथा मानवता के अस्तित्व के लिए खतरा बढ़ता ही जायेगा. ~नरेन्द्र गौनियाल

राहु

राहु: सर्पासुर का सिर, ब्रिटिश संग्रहालय
उत्तर
सहबद्धता ग्रह, असुर
मंत्र ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः॥
पत्नी कराली

वाहन
नील/ श्याम सिंह या आठ श्याम वर्णी घोड़ों द्वारा खींचा रथ

राहु () हिन्दू ज्योतिष के अनुसार उस असुर का कटा हुआ सिर है, जो ग्रहण के समय सूर्य या चंद्रमा का ग्रहण करता है। इसे कलात्मक रूप में बिना धड़ वाले सर्प के रूप में दिखाया जाता है, जो रथ पर आरूढ़ है और रथ आठ श्याम वर्णी घोड़ों द्वारा खींचा जा रहा है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार राहु को नवग्रह में एक स्थान दिया गया है। दिन में राहुकाल नामक मुहूर्त (२४ मिनट) की अवधि होती है जो अशुभ मानी जाती है।

समुद्र मंथन के समय राहु नामक एक असुर ने धोखे से दिव्य अमृत की कुछ बूंदें पी ली थीं। सूर्य और चंद्र ने उसे पहचान लिया और मोहिनी अवतार में भगवान विष्णु को बता दिया। इससे पहले कि अमृत उसके गले से नीचे उतरता, विष्णु जी ने उसका गला सुदर्शन चक्र से काट कर अलग कर दिया। इससे उसका सिर अमर हो गया। यही राहु ग्रह बना और सूर्य चंद्रमा से इसी कारण द्वेष रखता है। इसी द्वेष के चलते वह सूर्य और चंद्र को ग्रहण करने का प्रयास करता है। ग्रहण करने के पश्चात सूर्य या चंद्र उसके कटे गले से निकल आते हैं और मुक्त हो जाते हैं।

राहु की स्थिति

भारतीय ज्योतिष के अनुसार राहु और केतु सूर्य एवं चंद्र के परिक्रमा पथों के आपस में काटने के दो बिन्दुओं के द्योतक हैं जो पृथ्वी के सापेक्ष एक दुसरे के उल्टी दिशा में (१८० डिग्री पर) स्थित रहते हैं। चुकी ये ग्रह कोई खगोलीय पिंड नहीं हैं, इन्हें छाया ग्रह कहा जाता है। सूर्य और चंद्र के ब्रह्मांड में अपने-अपने पथ पर चलने के अनुसार ही राहु और केतु की स्थिति भी बदलती रहती है। तभी, पूर्णिमा के समय यदि चाँद राहू (अथवा केतु) बिंदु पर भी रहे तो पृथ्वी की छाया पड़ने से चंद्र ग्रहण लगता है, क्योंकि पूर्णिमा के समय चंद्रमा और सूर्य एक दुसरे के उलटी दिशा में होते हैं। ये तथ्य इस कथा का जन्मदाता बना कि "वक्र चंद्रमा ग्रसे ना राहू"। अंग्रेज़ी या यूरोपीय विज्ञान में राहू एवं केतु को को क्रमशः उत्तरी एवं दक्षिणी लूनर नोड कहते हैं।

गुण

राहु पौराणिक संदर्भों से धोखेबाजों, सुखार्थियों, विदेशी भूमि में संपदा विक्रेताओं, ड्रग विक्रेताओं, विष व्यापारियों, निष्ठाहीन और अनैतिक कृत्यों, आदि का प्रतीक रहा है। यह अधार्मिक व्यक्ति, निर्वासित, कठोर भाषणकर्त्ताओं, झूठी बातें करने वाले, मलिन लोगों का द्योतक भी रहा है। इसके द्वारा पेट में अल्सर, हड्डियों और स्थानांतरगमन की समस्याएं आती हैं। राहु व्यक्ति के शक्तिवर्धन, शत्रुओं को मित्र बनाने में महत्वपूर्ण रूप से सहायक रहता है। बौद्ध धर्म के अनुसार राहु क्रोधदेवताएं में से एक है।

शुम्भ और निशुम्भ
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(निशुम्भ से अनुप्रेषित)


शुम्भ और निशुम्ब से युद्ध करतीं हुईं देवी दुर्गा

हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार शुम्भ और निशुम्भ दो भाई थे जो महर्षि कश्यप और दनु के पुत्र तथा नमुचि के भाई थे। देवीमहात्म्य में इनकी कथा वर्णित है।

इंद्र ने एक बार नमुचि को मार डाला। रुष्ट होकर शुंभ-निशुंभ ने उनसे इंद्रासन छीन लिया और शासन करने लगे। इसी बीच दुर्गा ने महिषासुर को मारा और ये दोनों उनसे प्रतिशोध लेने को उद्यत हुए। इन्होंने दुर्गा के सामने शर्त रखी कि वे या तो इनमें किसी एक से विवाह करें या मरने को तैयार हो जाऐं। दुर्गा ने कहा कि युद्ध में मुझे जो भी परास्त कर देगा, उसी से मैं विवाह कर लूँगी। इस पर दोनों से युद्ध हुआ और दोनों मारे गए।

मयासुर
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श्रीकृष्ण मयासुर को पाण्डवों के लिये एक महल निर्माण का आदेश देते हुए

मय या मयासुर, कश्यप और दुन का पुत्र, नमुचि का भाई, एक प्रसिद्ध दानव। यह ज्योतिष तथा वास्तुशास्त्र का आचार्य था। मय ने दैत्यराज वृषपर्वन् के यज्ञ के अवसर पर बिंदुसरोवर के निकट एक विलक्षण सभागृह का निर्माण कर अपने अद्भुत शिल्पशास्त्र के ज्ञान का परिचय दिया था।

इसकी दो पत्नियाँ - हेमा और रंभा थीं जिनसे पाँच पुत्र तथा तीन कन्याएँ हुईं। जब शंकर ने त्रिपुरों को भस्म कर असुरों का नाश कर दिया तब मयासुर ने अमृतकुंड बनाकर सभी को जीवित कर दिया था किंतु विष्णु ने उसके इस प्रयास को विफल कर दिया। ब्रह्मपुराण (124) के अनुसार इंद्र द्वारा नमुचि का वध होने पर इसने इंद्र को पराजित करने के लिये तपस्या द्वारा अनेक माया विद्याएँ प्राप्त कर लीं। भयग्रस्त इंद्र ब्राह्मण वेश बनाकर उसके पास गए और छलपूर्वक मैत्री के लिये उन्होंने अनुरोध किया तथा असली रूप प्रकट कर दिया। इसपर मय ने अभयदान देकर उन्हें माया विद्याओं की शिक्षा दी।

रामायण में

रावण कि पत्नी मंदोदरी मायासुर कि पुत्री थी।
महाभारत में

महाभारत (आदिपर्व, 219.39; सभापर्व, 1.6) के अनुसार खांडव वन को जलाते समय यह उस वन में स्थित तक्षक के घर से भागा। कृष्ण ने तत्काल चक्र से इसका वध करना चाहा किंतु शरणागत होने पर अर्जुन ने इसे बचा लिया। बदले में इसने युधिष्ठिर के लिये सभाभवन का निर्माण किया जो मयसभा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसी सभा के वैभव को देखकर दुर्योधन पांडवों से डाह करने लगा था। इस भावना ने महाभारत युद्ध को जन्म दिया।

राजा बलि
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वामन और बलि
बलि सप्तचिरजीवियों में से एक, पुराणप्रसिद्ध विष्णुभक्त, दानवीर, महान्‌ योद्धा, विरोचनपुत्र दैत्यराज बलि वैरोचन जिसकी राजधानी महाबलिपुर थी। इसके छलपूर्वक परास्त करने के लिए विष्णु का वामनावतार हुआ था। इसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य की प्रेरणा से देवों को विजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और वहाँ धर्मशासन स्थापित किया। समुद्रमंथन से प्राप्त रत्नों के लिए जब देवासुर संग्राम छिड़ा और इंद्र द्वारा वज्राहत होने पर भी बलि शुक्राचार्य के मंत्रबल से पुन: जीवित हुआ तब इसने विश्वजित्‌ और शत अश्वमेध यज्ञों का संपादन कर समस्त स्वर्ग पर अधिकार जमा लिया। कालांतर में जब यह अंतिम अश्वमेघ यज्ञ का समापन कर रहा था, तब दान के लिए वामन रूप में ब्राह्मण वेशधारी विष्णु उपस्थित हुए। शुक्राचार्य के सावधान करने पर भी बलि दान से विमुख न हुआ। वामन ने तीन पग भूमि दान में माँगी और संकल्प पूरा होते ही विशाल रूप धारण कर प्रथम दो पगों में पृथ्वी और स्वर्ग को नाप लिया। शेष दान के लिए बलि ने अपना मस्तक नपवा दिया।

लोक मान्यता है कि पार्वती द्वारा शिव पर उछाले गए सात चावल सात रंग की बालू बनकर कन्याकुमारी के पास बिखर गए। 'ओणम' के अवसर पर राजा बलि केरल में प्रतिवर्ष अपनी प्यारी प्रजा को देखने आते हैं। राजा बलि का टीला मथुरा में है।

करिन्द्रासुर
कालनेमि
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कालनेमि एक राक्षस का नाम है। कालनेमि का उल्लेख सनातन धर्म से संबंधित रामायण काव्य में अाता है जब लंका युद्ध के समय लक्षमण मूर्छित हुये तो वैद्य सुषेन ने इसका उपचार संजीवनी बूटी बतायी जो हिमालय पर उप्लब्ध थी। हनुमान ने तुरंत हिमालय के लिये प्रस्थान किया। रावण ने हनुमान को रोकने हेतु मायावी कालनेमि को अाज्ञा दी। कालनेमि ने माया की रचना की तथा हनुमान को मार्ग में रोक लिया। हनुमान को मायावी कालनेमि का कुटिल उद्देश्य ज्ञात हुअा तो उन्होने उसका वध कर दिया।

काकासुर


कंस ने दूसरे दिन अपने दरबार में मंत्रियों को बुलवाया और योगमाया की सारी बातें उनसे बतायीं। कंस के मंत्री दैत्य होने के कारण स्वभाव से ही क्रूर थे। वे सब देवताओं के प्रति शत्रुता का भाव रखते थे। अपने स्वामी कंस की बात सुनकर उन सबों ने कहा- ‘यदि आपके शत्रु विष्णु ने कहीं और जन्म ले लिया है तो इस दस दिन के भीतर जन्में सभी बच्चों को आज ही मार डालेंगे। हम आज ही बड़े-बड़े नगरों, छोटे-छोटे गावों, अहीरों की बस्तियों में और अन्य स्थानों में जितने भी बच्चे पैदा हुए हैं, उन्हें खोजकर मारना शुरू कर देते हैं। शत्रु को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए। इसलिए उसे जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए आप हम जैसे सेवकों को आदेश दीजिए’। एक तो कंस की बुद्धि वैसे ही बिगड़ी हुई थी, दूसरे उसके मंत्री उससे भी अधिक दुष्ट थे। कंस के आदेश से दुष्ट दैत्य नवजात बच्चों को जहां पाते, वहीं मार देते। गोकुल में भी उत्पात शुरू हो गए। अभी छठी के दिन भगवान का जात कर्म संस्कार ही हुआ था कि कंस के द्वारा भेजी गई पूतना श्रीकृष्ण को मारने के लिए नंद बाबा के घर पहुंची। उसने सुंदर गोपी का वेष बनाकर श्रीकृष्ण को गोद में उठा लिया और अपने विष लगे स्तनों का दूध पिलाने लगी। श्रीकृष्ण ने दूध के साथ उसके प्राणों को भी खींच लिया और उसे यमलोक भेज दिया। एक दिन की बात है, नन्हें-से कन्हाई पालने में लेटे हुए अकेले ही कुछ हूं-हां कर रहे थे और अपने हाथ, पैरों को हिला रहे थे। उसी समय कंस का भेजा हुआ एक दुष्ट राक्षस कौवे का वेष बनाकर उड़ता हुआ वहां आ पहुंचा।

वह बहुत विकराल था और अपने पंखों को फड़फड़ा रहा था। वह पहले तो भयकंर रूप से बार-बार श्रीकृष्ण को डराने का प्रयास करने लगा, पर श्रीकृष्ण मुस्कुराते रहे। फिर वह क्रोधित होकर बालकृष्ण को मारने के लिए झपटा। बालरूप भगवान श्रीकृष्ण ने बायें हाथ से कसकर उसके गले को पकड़ लिया। उसके प्राण छटपटाने लगे। भगवान ने उसे घुमाकर इतनी जोर से फेंका कि वह कंस के सभा मंडप में जा गिरा। बड़ी मुश्किल से उसे होश में लाया गया। कंस ने घबड़ाकर उससे पूछा- तुम्हारी ये दशा किसने की? काकासुर ने कहा – राजन जिसने मेरी गर्दन मरोड़कर यहां फेंक दिया, वे कोई साधारण बालक नहीं हो सकता। निश्चित ही भगवान श्रीहरि ने अवतार ले लिया है।

मधु-कैटभ
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मधु-कैटभ का वध करते हुए विष्णु देवी महात्म्य का एक चित्र।
मधु और कैटभ सृष्टि के निर्माण की प्राचीन भारतीय अवधारणा से जुड़े हुए असुर हैं। इन दोनों का जन्म कल्पान्त तक सोते हुए विष्णु के दोनों कानों से हुई थी। जब वे ब्रह्मा को मारने दौड़े तो विष्णु ने उन्हें नष्ट कर दिया। तभी से विष्णु को 'मधुसूदन' एवं 'कैटभाजित्' कहते हैं। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार कैटभ का नाश उमा द्वारा हुआ था जिससे उन्हें 'कैटभा' कहते हैं। हरिवंश पुराण की अनुश्रुति है कि दोनों राक्षसों की मेदा की ढेर के कारण पृथ्वी का नाम मेदिनी पड़ गया।

जालन्धर

जालंधर जिले का नाम राक्षस के नाम पर रखा गया है, जिसका उल्लेख पुराण और महाभारत में भी हुआ है। जबकि कुछ का मानना है कि यह जगह राम के पुत्र लव की राजधानी थी। वही कुछ मानते हैं कि जालंधर का अर्थ पानी के अंदर होता है तथा यहां पर सतलुज और बीस नदियों का संगम होता है इसलिए इस जगह का नाम जालंधर रखा गया। जालंधर को त्रिरत्ता के नाम से भी जाना जाता है।

होलिका
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होलिका हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप नामक दैत्य की बहन और प्रह्लाद नामक विष्णु भक्त की बुआ थी। जिसका जन्म जनपद- कासगंज के सोरों शूकरक्षेत्र नामक पवित्र स्थान पर हुआ था। उसको यह वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जलेगी। इस वरदान का लाभ उठाने के लिए विष्णु-विरोधी हिरण्यकश्यप ने उसे आज्ञा दी कि वह प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश कर जाए, जिससे प्रह्लाद की मृत्यु हो जाए। होलिका ने प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश किया। ईश्वर कृपा से प्रह्लाद बच गया और होलिका जल गई। होलिका के अंत की खुशी में होली का उत्सव मनाया जाता है।

महिषासुर कौन था, जानिए उसकी कथा...


जेएनयू का 'महिषासुर' अब संसद तक पहुंच गया है। वामपंथी छात्रों ने जेएनयू में 2013 में महिषासुर शहादत दिवस मनाया था जिसमें देवी ‍दुर्गा का अपमान किया गया था। संसद में इस मुद्दे पर तीखा बवाल मचा हुआ है। जब केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने जेएनयू के पर्चे का संसद में उल्लेख किया तो विपक्ष ने हंगामा मचा दिया। स्मृति ने अपने भाषण में देवी दुर्गा के अपमान का मुद्दा उठाया था। आखिर कौन है यह महिषासुर जानिए, इसकी कहानी...

जिसने भी देवी दुर्गा का अपमान किया है उसे इसकी सजा जरूर मिलेगी। ऐसा कहा जाता है कि माता के गण अदृश्य रूप में विद्यमान रहते हैं। उनके गणों में भैरव और भैरवी प्रमुख हैं। माता दुर्गा के आगे हनुमान और पीछे भैरव की सवारी चलती है। वे लोग जिन्होंने कभी माता के बारे में जाना और समझा नहीं, वे उनके बारे में कुछ भी सोच सकते हैं। ऐसे लोग से कहना है कि वे हिम्मत दिखाएं किसी अन्य धर्म के देवता या पैगंबर के बारे में बोलने की।

भगवान शिव की चार पत्नियां थीं। पहली सती जो यज्ञ की आग में कूदकर भस्म हो गई। इसी माता सती ने पार्वती के रूप में नया जन्म लिया। फिर थीं उमा और काली। माता दुर्गा को सदाशिव की अर्धांगिनी कहा जाता है। उन्होंने ही मधु और कैटभ का वध किया था। उन्होंने ही शुम्भ और निशुम्भ का भी वध किया था। नवदुर्गा में से एक कात्यायन ऋषि की कन्या ने ही महिषासुर का वध किया था। उसका वध करने के बाद वे महिषसुर मर्दिनी कहलाई।

कौन था महिषासुर? रम्भासुर का पुत्र था महिषासुर, जो अत्यंत शक्तिशाली था। इसकी उत्पत्ति पुरुष और महिषी (भैंस) के संयोग से हुई थी इसीलिए उसे महिषासुर कहा जाता था। उसने अमर होने की इच्छा से ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए बड़ी कठिन तपस्या की। ब्रह्माजी उसके तप से प्रसन्न हुए। वे हंस पर बैठकर महिषासुर के निकट आए और बोले- 'वत्स! उठो, इच्छानुसार वर मांगो।' महिषासुर ने उनसे अमर होने का वर मांगा।

ब्रह्माजी ने कहा- 'वत्स! एक मृत्यु को छोड़कर, जो कुछ भी चाहो, मैं तुम्हें प्रदान कर सकता हूं क्योंकि जन्मे हुए प्राणी का मरना तय होता है। महिषासुर ने बहुत सोचा और फिर कहा- 'ठीक है प्रभो। देवता, असुर और मानव किसी से मेरी मृत्यु न हो। किसी स्त्री के हाथ से मेरी मृत्यु निश्चित करने की कृपा करें।' ब्रह्माजी 'एवमस्तु' कहकर अपने लोक चले गए।

वर प्राप्त करके लौटने के बाद महिषासुर समस्त दैत्यों का राजा बन गया। उसने दैत्यों की विशाल सेना का गठन कर पाताल लोक और मृत्युलोक पर आक्रमण कर समस्त को अपने अधीन कर लिया। फिर उसने देवताओं के इन्द्रलोक पर आक्रमण किया। इस युद्ध में भगवान विष्णु और शिव ने भी देवताओं का साथ दिया लेकिन महिषासुर के हाथों सभी को पराजय का सामना करना पड़ा और देवलोक पर भी महिषासुर का अधिकार हो गया। वह त्रिलोकाधिपति बन गया।

भगवान विष्णु ने कहा ने सभी देवताओं के साथ मिलकर सबकी आदि कारण भगवती महाशक्ति की आराधना की। सभी देवताओं के शरीर से एक दिव्य तेज निकलकर एक परम सुन्दरी स्त्री के रूप में प्रकट हुआ। हिमवान ने भगवती की सवारी के लिए सिंह दिया तथा सभी देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र महामाया की सेवा में प्रस्तुत किए। भगवती ने देवताओं पर प्रसन्न होकर उन्हें शीघ्र ही महिषासुर के भय से मुक्त करने का आश्वासन दिया।

भगवती दुर्गा हिमालय पर पहुंचीं और अट्टहासपूर्वक घोर गर्जना की। महिषासुर के असुरों के साथ उनका भयंकर युद्ध छिड़ गया। एक-एक करके महिषासुर के सभी सेनानी मारे गए। फिर विवश होकर महिषासुर को भी देवी के साथ युद्ध करना पड़ा। महिषासुर ने नाना प्रकार के मायिक रूप बनाकर देवी को छल से मारने का प्रयास किया लेकिन अंत में भगवती ने अपने चक्र से महिषासुर का मस्तक काट दिया। कहते हैं कि देवी कात्यायनी को ही सभी देवों ने एक एक हथियार दिया था और उन्हीं दिव्य हथियारों से युक्त होकर देवी ने महिषासुर के साथ युद्ध किया था।

महिषासुर

चामुण्डी पर्वत पर स्थित महिषासुर की प्रतिमा, मैसूर

पूर्वकाल की बात है। रम्भ दानव को महिषासुर नामक एक प्रबल पराक्रमी तथा अमित बलशाली पुत्र हुआ उसने अमर होने की इच्छा से ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिये बड़ी कठिन तपस्या की। उसकी दस हज़ार वर्षों की तपस्या के बाद लोकपितामह ब्रह्मा प्रसन्न हुए। वे हंस पर बैठकर महिषासुर के निकट आये और बोले-'वत्स! उठो, अब तुम्हारी तपस्या सफल हो गयी। मैं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करूँगा। इच्छानुसार वर माँगो।' महिषासुर ने उनसे अमर होने का वर माँगा।

ब्रह्माजी ने कहा- 'पुत्र! जन्मे हुए प्राणी का मरना और मरे हुए प्राणी का जन्म लेना सुनिश्चित है। अतएव एक मृत्यु को छोड़कर, जो कुछ भी चाहो, मैं तुम्हें प्रदान कर सकता हूँ। महिषासुर बोला-'प्रभो! देवता, दैत्य, मानव किसी से मेरी मृत्यु न हो। किसी स्त्री के हाथ से मेरी मृत्यु निश्चित करने की कृपा करें।' ब्रह्माजी 'एवमस्तु' कहकर अपने लोक चले गये। वर प्राप्त करके लौटने के बाद समस्त दैत्यों ने प्रबल पराक्रमी महिषासुर को अपना राजा बनाया। उसने दैत्यों की विशाल वाहिनी लेकर पाताल और मृत्युलोक पर धावा बोल दिया। समस्त प्राणी उसके अधीन हो गये। फिर उसने इन्द्रलोक पर आक्रमण किया। इस युद्ध में भगवान विष्णु और शिव भी देवराज इन्द्र की सहायता के लिये आये, किन्तु महाबली महिषासुर के सामने सबको पराजय का मुख देखना पड़ा और देवलोक पर भी महिषासुर का अधिकार हो गया। भगवान शंकर और ब्रह्मा को आगे करके सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गये और महिषासुर के आतंक से छुटकारा प्राप्त करने का उपाय पूछा। भगवान विष्णु ने कहा- 'देवताओं! ब्रह्मा जी के वरदान से महिषासुर अजेय हो चुका है। हममें से कोई भी उसे नहीं मार सकता है। आओ! हम सभी मिलकर सबकी आदि कारण भगवती महाशक्ति की आराधना करें।' फिर सभी लोगों ने मिलकर भगवती की आर्तस्वर में प्रार्थना की। सबके देखते-देखते ब्रह्मादि सभी देवताओं के शरीरों से दिव्य तेज़ निकलकर एक परम सुन्दरी स्त्री के रूप में प्रकट हुआ। भगवती महाशक्ति के अद्भुत तेज़ से सभी देवता आश्चर्यचकित हो गये। हिमवान ने भगवती के सवारी के लिये सिंह दिया तथा सभी देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र महामाया की सेवा में प्रस्तुत किये। भगवती ने देवताओं पर प्रसन्न होकर उन्हें शीघ्र ही महिषासुर के भय से मुक्त करने का आश्वासन दिया।

पराम्बा महामाया हिमालय पर पहुँचीं और अट्टहासपूर्वक घोर गर्जना की। उस भयंकर शब्द को सुनकर दानव डर गये और पृथ्वी काँप उठी। महिषासुर ने देवी के पास अपना दूत भेजा। दूत ने कहा- 'सुन्दरी! मैं महिषासुर का दूत हूँ। मेरे स्वामी त्रैलोक्यविजयी हैं। वे तुम्हारे अतुलनीय सौन्दर्य के पुजारी बन चुके हैं और तुम से विवाह करना चाहते हैं। देवि! तुम उन्हें स्वीकार करके कृतार्थ करो।' भगवती ने कहा- 'मूर्ख! मैं सम्पूर्ण सृष्टि की जननी और महिषासुर की मृत्यु हूँ। तू उससे जाकर यह कर दे कि वह तत्काल पाताल चला जाय, अन्यथा युद्ध में उसकी मृत्यु निश्चित है।' दूत ने अपने स्वामी महिषासुर को देवी का संदेश दिया। भयंकर युद्ध छिड़ गया। एक-एक करके महिषासुर के सभी सेनानी देवी के हाथों से मृत्यु को प्राप्त हुए। महिषासुर का भी भगवती के साथ महान् संग्राम हुआ। उस दुष्ट ने नाना प्रकार के मायिक रूप बनाकर महामाया के साथ युद्ध किया। अन्त में भगवती ने अपने चक्र से महिषासुर का मस्तक काट दिया। देवताओं ने भगवती की स्तुति की और भगवती महामाया प्रत्येक संकट में देवताओं का सहयोग करने का आश्वासन देकर अन्तर्धान हो गयीं।

महिषासुर आन्दोलन की सैद्धांतिकी : एक संरचनात्मक विश्लेषण

महिषासुर आंदोलन/विमर्श एक देशव्यापी जिज्ञासा का विषय बन चुका है। इसके संदर्भ में विभिन्न कोणों से विविध तरह के सवाल उठ रहे हैं। यह आंदोलन किन सिद्धांतों पर आधारित है, इसकी मूल संरचना क्या है और इसके कितने आयाम हैं, विश्लेषण कर रहे हैं अनिल कुमार :


महिषासुर आंदोलन आज एक व्यापक स्वरूप ग्रहण कर चुका है। जहां एक ओर विमर्श के स्तर पर इसने बौद्धिक जगत को गहरे स्तर तक प्रभावित किया है, वहीं दूसरी ओर यह एक व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन का शक्ल भी अख्तियार करने की ओर बढ़ रहा है। विमर्श के स्तर पर यह मिथकों और इतिहास की आर्य-ब्राह्मणवादी व्याख्याओं को चुनौती दे रहा है, तो जमीनी आंदोलन के स्तर पर आर्य-ब्राह्मणवादी संस्कृति और परंपराओं के बरक्स वैकल्पिक या भुला दी गई संस्कृतियों और परंपराओं को नए सिरे से पुनर्जीवित कर रहा है। इस प्रकार महिषासुर विमर्श आर्य-ब्राह्मणवादी और आज की हिन्दुत्व की परियोजना के लिए एक चुनौती की तरह सामने आया है। इसकी अनुगूंज भारतीय संसद तक में सुनाई दी।


बीते 18 सितंबर 2017 को मैसूर, कर्नाटक में महिष दसरा के मौके पर प्रो. बी. पी. महेश चंद्र गुरू एवं अन्य

आंदोलन और विमर्श के स्तर पर इसकी बढ़ती लोकप्रियता ने इसके सामने बहुत सारे प्रश्न भी खड़े किए हैं। ये प्रश्न दोनों स्तरों पर हैं। विमर्श के स्तर पर भी और आंदोलन के स्तर पर भी। ये प्रश्न महिषासुर आंदोलन की एक सैद्धांतिकी की मांग कर रहे हैं। इस बात की भी मांग कर रहे हैं कि इस आंदोलन की संरचनात्मक विश्लेषण की जाय। आज यह जरूरी भी हो गया है, क्योंकि यह आंदोलन जिस मुकाम पर पहुंच गया है, वहां इसकी सैद्धांतिकी को ऩए सिरे से प्रस्तुत करने की जरूरत है, साथ ही इसका संरचनागत विश्लेषण भी किया जाना चाहिए। वैसे हम सभी यह जानते हैं कि कोई भी सैद्धांतिकी हमेशा अधूरी होती है, खास कर उस मामले में जब वह किसी आंदोलन की पैदाइश हो, और वह आंदोलन जीवन्त रूप में जारी हो। फिर आंदोलन के अलग-अलग मुकामों पर उसकी सैद्धांतिकी प्रस्तुत करना और आंदोलन के संदर्भ में उठ रहे सवालों का जवाब देना जरूरी होता है। इस आलेख के माध्यम से मैं अपनी इस जिम्मेदारी का निर्वाह करना चाहता हूं।

महिषासुर आंदोलन/विमर्श क्यों?

इस आंदोलन से जिस प्रश्न का जवाब सबसे अधिक मांगा जा रहा है, वह प्रश्न यह है कि महिषासुर आंदोलन का उद्देश्य क्या है? यह आंदोलन क्यों चलाया जा रहा है? इस आंदोलन को किस रूप में देखा जाय? क्या इसका भारत के वर्तमान को बदलने और बेहतर भविष्य के निर्माण से कोई संबंध है? या यह सिर्फ मिथकों या अतीत का पुनर्पाठ है, गड़े मुर्दे उखाड़ना है? इस तरह के सवाल सिर्फ उनके तरफ से नहीं आ रहे हैं, जिन्होंने इतिहास को मिथक में तब्दील कर अपना वर्चस्व स्थापित किया और इस वर्चस्व को हर हालात में बनाए रखना चाहते हैं। दुखद यह है कि यह सवाल उनकी तरफ से भी आए हैं, जो अपने को प्रगतिशील कहते हैं और वर्चस्व के सभी रूपों के खात्मे की बातें करते हैं।


महिषासुर विमर्श पर आधारित प्रमोद रंजन द्वारा संपादित पुस्तक

महिषासुर आंदोलन क्यों? इस सवाल का जवाब भारतीय इतिहास के प्रति नजरिए से जुड़ा है। हम सभी जानते हैं कि वर्तमान इतिहास की ही पैदाइश होता है और भविष्य निर्माण के बीज वर्तमान में मौजूद होते हैं। इसलिए यह स्थापित धारणा है कि इतिहास का अध्ययन और विश्लेषण का वर्तमान और भविष्य से गहरा संबंंध होता है। महिषासुर आंदोलन इतिहास या मिथकीकृत इतिहास की पुनर्व्याख्या क्यों करना चाहता है, क्यों पुनर्पाठ करना चाहता है, उसे इसकी जरूरत क्यों पड़ रही है, क्यों वह इतिहास या मिथकों की अब तक की अधिकांश व्याख्याओं को केवल अधूरा ही नहीं पा रहा है, बल्कि सिर के बल खड़ा पा रहा है। इसकी व्याख्या करने से पहले इस बात की अत्यन्त संक्षेप में ही सही चर्चा कर लेना जरूरी है कि भारतीय इतिहास को लेकर मुख्यतः कौन-कौन सी दृष्टियां रही हैं। उनकी क्या बुनियादी कमजोरियां रही हैं, इसका जायजा ले लिया जाय। साथ ही इस बात पर भी विचार कर लिया जाय कि क्या कोई ऐसी इतिहास दृष्टि रही है, जो महिषासुर आंदोलन के अगुआ लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत रही हो, जिसके साथ महिषासुर आंदोलन स्वयं को जोड़ता हो।

सबसे पहले भारतीय इतिहास की मुख्य धाराओं की चर्चा करते हैं। हम सभी जानते हैं कि भारतीय इतिहास को लेकर चार दृष्टियां मौजूद रही हैं – पहली औपनिवेशिक इतिहास दृष्टि, दूसरी राष्ट्रवादी इतिहास दृष्टि, तीसरी वामपंथी दृष्टि और चौथी बहुजन इतिहास दृष्टि। औपनिवेशिक इतिहास दृष्टि को काफी पहले ही यह कह कर खारिज किया जा चुका है कि इसके केंद्र में ब्रिटिश साम्राज्य को भारत में जायज ठहराना रहा है। वामपंथी इतिहासकारों ने राष्ट्रवादी इतिहास दृष्टि को यह कह कर खारिज कर दिया कि यह दृष्टि उच्चवर्गीय दृष्टि रही है। वामपंथी इतिहास दृष्टि ने स्वयं को भारतीय इतिहास के सच्चे दावेदार के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन बहुजन इतिहास दृष्टि ने तथ्यों और तर्कों से यह प्रमाणित कर दिया कि भारतीय वामपंथी इतिहास दृष्टि मूलतः द्विज केंद्रित इतिहास दृष्टि रही है। कुछ एक वामपंथी इतिहासकार एक हद तक इसके अपवाद हो सकते हैं। चौथी बहुजन इतिहास दृष्टि है, जो यह सिद्धांत प्रतिपादित करती है कि भारतीय इतिहास को देखते समय वर्ग की जगह वर्ण/जाति को केंद्र में रखा जाना चाहिए। बहुजन इतिहास को प्रमोद रंजन (2016a) के शब्दों में इस प्रकार रख सकते है, “बहुजन इतिहास की अवधारणा अपने आप में सीधी है- अभिजन के विपरीत; बहुजन का इतिहास। जैसा कि ढाई हजार साल पहले बु्द्ध ने कहा था – बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय। बहुजन इतिहास बहुसंख्यों के इतिहास पर जरूर जोर देता है, लेकिन इसका अर्थ बहुसंख्यकों का इतिहास नहीं है। इसका आधार संख्या बल नहीं, बल्कि इसके विपरीत सामाजिक और सांस्कृतिक वंचना के पक्ष में जिस सामूहिक-सामुदायिक-सांप्रदायिक चेतना का निर्माण मनुवाद करता है, बहुजन इतिहास उसके विरूद्ध विभिन्न सामाजिक तबकों की प्रतिनिधि आवाज बनता है। यह इतिहास समाज के उस अंतिम आदमी का भी इतिहास है, जो किसी भी प्रकार की वंचना झेल रहा है।” यह बात सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में विशेष तौर पर लागू होती है, जो भारत में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक प्रभु्त्व का मुख्य औजार रहा है। महिषासुर आंदोलन भारतीय समाज में वर्चस्व के सभी रूपों का आधार, द्विज केंद्रित सांस्कृतिक वर्चस्व को तोड़कर बहुजन केंद्रित संस्कृति की स्थापना करना चाहता है। पुनः यदि प्रमोद रंजन (2016b) के शब्दों में कहें तो, “वर्ण-जाति के प्रभुत्व वाले समाज में इतिहास की बहुजन अवधारणा विभिन्न वंचित सामाजिक समूहों की साझी पीड़ाओं और सांंस्कृतिक अभिव्यक्तियों की समानता को लक्षित करती है तथा उन सभी लोगों को साथ लेकर चलने का वादा करती है, जो इन अमानवीयताओं के विरूद्ध आवाज उठाने के लिए प्रतिबद्ध है।” यहां पर एक बात याद रखना अत्यन्त आवश्यक है कि भारत में द्विज सांस्कृतिक वर्चस्व अपने को धर्म के आवरण में प्रस्तुत करता रहा है, अब भी कर रहा है। इसका परिणाम यह होता है कि द्विज संस्कृति के खिलाफ कोई संघर्ष हिंदू धर्म के खिलाफ संघर्ष बन जाता है और इसके खिलाफ संघर्ष करने वाले लोगों को धर्म द्रोही या धर्म का अपमान करने वाला, यहां तक की राष्ट्रद्रोही भी ठहराया दिया जाता है। यह कोई नई बात नहीं है, हजारों वर्ष पहले आर्य-ब्राह्मणवादी द्विज संस्कृति को न मानने वाले और उसका प्रतिवाद करने वाले लोगों को नकारात्मक अर्थो में असुर, देैत्य, राक्षस आदि ठहरा दिया गया। महिषासुर आंदोलन अपने को इन्ही असुरों, राक्षसों और देैत्यों से जोड़ता है और मानता हैं कि इस देश के बहुजन इन्हीं के वंशज हैं।

भारत की सांस्कृतिक इतिहास को बहुजन दृष्टि से देखने और द्विज केंद्रित सांस्कृतिक इतिहास दृष्टियों से टकराने का यह काम कोई नया नहीं है, भले इसका ताप-तेवर नया हो, संघर्ष के स्थल नए हों, संघर्ष के उपकरण नए हों, असल बात तो यह है कि महिषासुर आंदोलन की सांस्कृतिक इतिहास दृष्टि के प्रेरणास्रोत फुले, पेरियार और आंबेड़कर हैं। जिसे वर्तमान समय में गेल ऑमवेट जैसे कई सारे सांस्कृतिक इतिहासकार आगे बढ़ा रहे है। महिषासुर आंदोलन फुले, आंबेडकर और पेरियार की भारतीय सांस्कृतिक इतिहास को देखने के नजरिए को व्यापक बहुजन तबके तक ले जाना चाहता है, जिसमें आदिवासी, दलित, पिछड़े और महिलाएं शामिल हैं। इस सांस्कृतिक संघर्ष का केंद्रीय कार्यभार ब्राह्मणवादी मिथकों के वाक्-जाल में ढंक दिए बहुजन के इतिहास को उजागर करना है, इन मिथकों में अपमानित और लांछित किए गए, असुर, राक्षस और दैत्य ठहराए गए बहुजनों के महान नायकों के वास्तविक चरित्र को सामने लाना है। ब्राह्मणवादी-द्विज संस्कृति ने जिन महान बहुजन नायकों को वास्तविक इतिहास से गायब कर मिथक में बदल दिया, उन्हें राक्षस ठहरा दिया। उसमें एक केंद्रीय चरित्र महिषासुर है। उनकी उपस्थिति आज भी भारतीय भूभाग के व्यापक हिस्से में लोक जीवन में बनी हुई है। उन्हें राक्षस ठहराने वाले लोगों की सैकडों वर्षों की लाख कोशिशों के बाद भी वे दलितों-ओबीसी-आदिवासियों के एक बड़े हिस्से के बीच नायक के रूप में स्थापित हैं और महिषासुर आंदोलन के बाद यह व्यापकता बढती जा रही है। महिषासुर आंदोलन में महिषासुर केवल ऐतिहासिक वास्तविक महान जननायक के रूप में ही नहीं मौजूद हैं, वे द्विज संस्कृति के खिलाफ संघर्ष के सबसे केंद्रीय प्रतीक भी हैं। वे संघर्ष और प्रतिरोध की परंपरा के प्रतीक पुरूष हैं, जो संघर्ष हजारों वर्षों से द्विजों और बहुजनों के बीच चला आ रहा है।

महिषासुर आंदोलन के केंद्रीय लक्ष्य और इतिहास दृष्टि को रेखांकित करने के बाद मैं एक-एक करके उन प्रश्नों को लूंगा, जो पूछे जा रहे हैं, उन मुख्य आरोपों का भी जवाब देने की कोशिश करूंगा, जो आंदोलन के ऊपर लगाए जा रहे हैं। इस सब का उद्देश्य आंदोलन की अवस्थिति को स्पष्ट करना है।

महिषासुर की ऐतिहासिकता का प्रश्न

सबसे ज्यादा प्रश्न महिषासुर की ऐतिहासिकता को लेकर पूछे जाते हैं। इस तथ्य से शायद ही कोई नावाकिफ हो कि क्यों और कैसे भारत के कुछ समुदायों का इतिहास मिटा दिया गया। अंधकार के उस कूप में डाल दिया गया, जहां से उसे उजाले में लाना एक चुनौती भरा काम बन गया। यह काम उन लोगों ने किया जो अपने को विद्वान, बुद्धिजीवी, इतिहासकार, समाज विज्ञानी, साहित्यकार और सांस्कृतिक व्यक्ति समझते हैं। स्वयं को इन अनुशासनों के कर्ता-धर्ता समझते हैं। वही लोग आज यह पूछ रहे हैं क्या महिषासुर कोई ऐतिहासिक पात्र है? महिषासुर आंदोलन ने कभी यह नहीं कहा कि महिषासुर का जन्म फला तारीख को, फला जगह पर हुआ था। झूठे तथ्य गढ़ना, मनगढंत कहानियों को इतिहास के तथ्य की तरह प्रस्तुत करना ब्राह्मणवादियों की परंपरा रही है। उनकी इस कपोल-कल्पना की पैदाइश दुर्गा जैसी देवियां हैं, जिन्हें महिषासुर का वध करने वाली देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उदार राजा के रूप में प्रतिष्ठित महिषासुर को राक्षस या दैत्य बना दिया गया। झूठ गढ़ने और फिर उस झूठ को इतिहास की तरह या तथ्य की तरह प्रस्तुत करने की परंपरा ब्राह्मणवादियों की रही है। महिषासुर आंदोलन किसी झूठ के आधार पर कोई प्रस्थापना नहीं करना चाहता है।

इस आंदोलन का सिर्फ इतना ही कहना है कि देश के विभिन्न हिस्सों में विविध समुदायों द्वारा महिषासुर को अपने नायक रूप में देखा जाता है। कुछ समुदाय ऐसे हैं जो बहुत पहले से दुर्गा-पूजा के दिन को शोक-दिवस के रूप में मनाते हैं। देश के इस छोर से लेकर उस छोर तक बहुत सारे स्थान हैं, जहां महिषासुर के स्थल है। इन स्थानों पर दूर-दूर से लोग आते हैं और अपने नायक का दर्शन करते हैं, उनके प्रति सम्मान और श्रद्धा प्रकट करते हैं। जैसा कि लोक करता है, उनमें कुछ लोग अपने महिषासुर की आराधना भी करते हैं, प्रार्थना भी करते हैं। मैसूर जैसे स्थलों का नाम ही महिषासुर के नाम पर पड़ा है। प्रमोद रंजन और उनके साथियों ने ऐसे अनेक स्थलों की भी पहचान की है। जनवरी-फ़रवरी 2017 के दौरान ऐसी ही एक यात्रा में मैं भी उनके साथ था। ये स्थल देश के कई हिस्सों में फैले हुए हैं, जिनमें कर्नाटक, उत्तर प्रदेश (महोबा, बनारस) महाराष्ट्र के कई हिस्से, और मध्य प्रदेश (खजुराहो, छतरपुर) आदि शामिल हैं। इसके अलावा झारखण्ड, पश्चिम बंगाल आदि जगहों पर अपने को महिषासुर का वंशज मानने वाले लोग भी हैं। इसमें झारखण्ड के पूर्व मुुख्यमंत्री शिबू सोरेन भी शामिल हैं। इसके अलावा प्रोफेसर महेश गुरू, वंदना टेटे, सुषमा असुर, आदि अनेक लोग अपने को महिषासुर का वंशज बताते हैं। जन सामान्य में महिषासुर की उपस्थिति कितने रूपों में, कहां-कहां और किन समुदायों में है। इस संदर्भ में विस्तृत सामग्री अनेक स्थानों पर प्रकाशित हो चुकी है। इस लिए यहां मैं इसके विस्तार में जाने से बच रहा हूं।


बालाघाट, मध्यप्रदेश में महिषासुर समर्थकों द्वारा लगाया गया एक बैनर

यहां यह कहना अत्यन्त आवश्यक है कि महिषासुर की इतनी व्यापक उपस्थिति बताती है कि भारत में एक विशाल समुदाय ऐसा रहा है, जो महिषासुर को अपना नायक मानता रहा है। यह समुदाय किसी महान सभ्यता, संस्कृति और जीवन-पद्धति का वाहक था। जिसका विध्वंस किया गया और पहले तो इस सभ्यता और जीवन-पद्धति से जुड़े लोगों और उनके नायकों के नामो-निशान को मिटाने की कोशि्श की गई, जब इसमें पूरी तरह सफलता नहीं मिली तो, इन्हें और इनकी जीवन-पद्धति को बदनाम करने का एक व्यापक अभियान चला। इस अभियान का एक हिस्सा विभिन्न पुराणों और अन्य साहित्य की रचना करना भी था। इन पुराणों के मिथकों के माध्यम से इतिहास को उलट दिया गया। इन पुराणों में खुद महिषासुर और उनके अनुयायियों को नकारात्मक अर्थो में राक्षस आदि का दर्जा दिया गया। सबसे त्रासद बात तो यह है कि यह सबकुछ इस धूर्तता और मक्कारी के साथ किया गया कि महिषासुर के वंशजों के एक बड़े हिस्से ने धीरे-धीरे इस मिथकों के झूठ को सच मान लिया। महिषासुर आंदोलन ने एक महत्वपूर्ण कार्य यह किया कि उसने महिषासुर संस्कृति के पुराने वारिसों को फिर अपने पुऱखे की खोज के लिए प्रेरित किया। यह एहसास दिलाया कि तुम जिस महिषासुर को राक्षस मान रहे हो, वह तुम्हारी संस्कृति का प्रतीक पुरूष है। एक बुद्धिमान , न्यायप्रिय और लोक कल्याणकारी राजा का प्रतिमान है। ब्राह्मणवादी मिथकों के प्रभाव में यहां के प्राचीन निवासी या ब्राह्मणेत्तर संस्कृतियों के लोग धीरे-धीरे अपने बु्द्धिमान, उदार और न्यायप्रिय राजा के प्रतिमान को भुलाना शुरू कर देते हैं और धीरे-धीरे समाज के एक बड़े हिस्से में ब्राह्मणवादी महिषासुर को दानव के रूप में स्थापित करने में सफल हो जाते हैं, भले ही इनके प्रभाव में न आने वाले या पूरी तरह इनके प्रभाव में न आने वाले समुदायों में महिषासुर को नायक मानने की परंपरा कायम रहती है।

यहां एक बात याद रखना जरूरी है कि भारत के जिन प्राचीन निवासियों या ब्राह्मणेत्तर संस्कृति के लोगों ने ब्राह्मणवादी/ आर्य संस्कृति को स्वीकार कर महिषासुर को भुला दिया या उन्हें दानव मान लिया। क्या उन्हें ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचना में समानता के स्तर पर समाहित किया गया, तो इसका जवाब है – नहीं। इसका कारण यह है कि कोई भी किसी सामाजिक संरचना का अभिन्न अंग दूसरों के संस्कृति की नकल करके नहीं बन सकता है, और न ही वह संस्कृति उसकी अपनी संस्कृति बन सकती है। दूसरी संस्कृति और जीवन-पद्धति की नकल कर केवल ‘सांस्कृतिक गुलाम” ही बना जा सकता है। वास्तव में गैर-अनार्यों, गैर-सवर्णोंं, भारत के प्राचीन निवासियों के संदर्भ में यही घटित हुआ। उनका बड़ा हिस्सा सांस्कृतिक गुलाम तो बन गया कि लेकिन वह कभी सही अर्थो में ब्राह्मणवादी स्ंस्कृति का हिस्सा नहीं बना, बन भी नहीं सकता था। वह इनका सांस्कृतिक गुलाम बन कर रहा गया।

महिषासुर आंदोलन और वर्चस्वशाली सांस्कृतिक राष्ट्रीयता का प्रश्न

यहां राष्ट्रीयता शब्द का इस्तेमाल एक समुदाय की सांस्कृतिक पहचान के रूप में किया गया है। यह ऐतिहासिक तौर पर स्थापित सत्य है कि एक समुदाय या वर्ग विशेष द्वारा दूसरे समुदाय या वर्ग विशेष पर अपना आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक प्रभुत्व बनाने तथा कायम रखने की अनिवार्य शर्त होती है कि वह अपना सांस्कृतिक वर्चस्व कायम करे। पूरी दुनिया में प्रभुत्वशाली सांस्कृतिक राष्ट्रीयताएं दूसरी सांस्कृतिक राष्ट्रीयताओं को कुचल कर ही अपना वर्चस्व कायम करती हैं। लोगों के चिंतन और क्रियाशीलता पर नियंत्रण किए बिना उन पर वर्चस्व कायम करना नामुमकिन है। यह काम केवल भौतिक साधनों पर नियंत्रण कर नहीं किया जा सकता है। इसलिए उनका जोर संस्कृति पर नियंत्रण करने का होता है। इसका कारण यह है कि हमेशा वर्चस्वशाली समुदाय या वर्ग की संख्या कम होती है और उनकी अधीनता में रहने वालों की संख्या विशाल होती है। एक विशाल आबादी को केवल ताकत के बल पर लंबे समय तक अधीन नहीं बनाए रखा जा सकता है। प्रसिद्ध इटालियन मार्क्सवादी चिन्तक अंतोनियो ग्राम्शी (1929-1935/ 1971) ने भी इस पर जोर दिया है कि संस्कृति वह प्रमुख तत्व है जिसके अाधार पर किसी दूसरे समुदाय पर शासन किया जा सकता है, प्रभुत्व स्थापित किया जा सकता है। इस स्थिति में अल्पसंख्यक वर्चस्वशाली समुदाय या वर्ग के लिए यह अनिवार्य और अपरिहार्य होता हैं कि वह अपना वैचारिक वर्चस्व कायम करे। अपनी जीवन-पद्धति और संस्कृति की श्रेष्ठता को स्थापित करे। अधीन वर्ग यह स्वीकर करे कि वर्चस्वशाली वर्ग श्रेष्ठ और महान है। यह सब कुछ सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करके किया जाता है। फुले, पेरियार और आंबेडकर बार-बार यह रेखांकित करते हैं कि ब्राह्मणवादी संस्कृति के वर्चस्व की स्वीकृति ही वह बुनियादी आधार था, जिसके चलते शूद्र-अन्त्यज हजारों वर्षो तक मुट्ठी भर द्विजों की गुलामी करते रहे।


दिसंबर 2014 में हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में महिषासुर शहादत दिवस समारोह के मौके पर छात्र व छात्रायें
(https://www.forwardpress.in/2017/09/mahishasura-movement-hindi/ )

सांस्कृतिक वर्चस्व भौतिक साधनों पर वर्चस्व का वैचारिक आधार होता है। इसकी स्वीकृति मार्क्सवाद में भी मिलती है। मार्क्स उत्पादन के साधनों पर वर्चस्व को “आधार-संरचना” कहते हैं, और इस “आधार-संरचना” को वैधता प्रदान करने वाले वैचारिक उपकरणों को “अधिरचना” । वे स्पष्ट कहते हैं कि “आधार-संरचना” पर जोर देने का अर्थ यह नहीं है कि “अधिरचना” को कम करके आंका जाए। अंतोनियो ग्राम्शी इसे और गहराई में ले जाते हैं और कहते हैं कि प्रभुत्वशाली वर्ग अपनी संस्कृति को “सामान्य चेतना” का विषय बना देता है। इस “सामान्य चेतना” की व्याख्या करते हुए वे कहते हैं कि “सामान्य चेतना स्वाभाविक विश्वासों और मान्यताओं में निहित होती है, जो किसी दी गई सामाजिक व्यवस्था में अधिकतर लोगों द्वारा स्वीकार किया जाता है और उसे व्यवहार में लाया जाता है।” उन्होंने आगे स्पष्ट किया किया कि “सामान्य चेतना की स्थापना सत्ताधारी वर्ग की सहमति और उसके हित में किया जाता है, जिसे समाज का एक बड़ा वर्ग अपने सामान्य हित का मान कर स्वीकार करता है।” मार्क्स के सांस्कृतिक वर्चस्व के सिद्धांत या अधिरचना के सिद्धांत को अंतोनियो ग्राम्शी और माओ दोनों ने पहचाना था। उन्होंने वर्चस्वशाली संस्कृति को स्वीकार करने वाले बहुसंख्यक लोगों से सांस्कृतिक क्रान्ति तक करने का आह्वान किया।

फुले, पेरियार और आंबेडकर की वैचारिकी और संघर्ष का केंद्रीय तत्व, उस सांस्कृतिक वर्चस्व को तोड़ना है, जो इस देश में अन्य सभी प्रकार के वर्चस्वों का आधार रही है। अपने को इस परंपरा से जोड़ते हुए महिषासुर आंदोलन के एक प्रमुख प्रस्तोता प्रमोद रंजन (2014a, 2014b) लिखते हैं कि “हमारे पास जोती राव फुले, डॉ. आंबेडकर और रामास्वामी पेरियार की तेजस्वी परंपरा है, जिसने आधुनिक काल में मिथकों के वैज्ञानिक अध्ययन की जमीन तैयार की है।” ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक वर्चस्व को समझने और इसके खिलाफ निर्णायक संघर्ष करने से भारतीय वामपंथियों ने कमोबेश इंकार कर दिया था। वे यांत्रिक तौर पर आर्थिक तत्वों को सबकुछ ठहराते रहे। भले ही मार्क्स से लेकर ग्राम्शी तक उनकी इस अवधारणा के साथ न खड़े हों। भारत में ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष को या तो दबा दिया गया या फिर विकृत कर दिया गया। गैर-ब्राह्मणवादी संस्कृतियों की परंपरा की पहचान और उनकी पुनर्स्थापना सिर्फ आधुनिक युग की परिघटना नहीं है। बुद्ध का संघर्ष धार्मिक नहीं, सांस्कृतिक है, कबीर, रैदास और देश के अन्य हिस्सों में अनेकानेक व्यक्तित्वों ने इस सांस्कृतिक संघर्ष को मध्यकाल में चलाया। आधुनिक युग में फुले, पेरियार और आंबेडकर इसे एक नए मुकाम पर ले गए।

महिषासुर आंदोलन इस सांस्कृतिक संघर्ष को आगे बढ़ा रहा है। क्योंकि इस आंदोलन का यह मानना है कि स्थापित और आदर्श के रूप में प्रस्तुत की गई सांस्कृतिक संरचना को तोड़े बिना वर्तमान में स्थापित प्रभुत्व को तोड़ा नहीं जा सकता है। इसी बात को रेखांकित करते हुए प्रमोद रंजन (2014b) लिखते हैं कि “सांस्कृतिक गुलामी क्रमशः सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक गुलामी को मजबूत करती है। उत्तर भारत में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक गुलामी के विरूद्ध तो संघर्ष हुआ, लेकिन सांस्कृतिक गुलामी अभी भी लगभग अछूती रही है। जो संघर्ष हुए भी हैं, वे प्रायः धर्म सुधार के लिए हुए हैं अथवा उनका दायरा ब्राह्मण- द्विजों में मौजूद सामाजिक विकृतियों को कम करने तक सीमित रहा है। मनुवाद की नाभि पर प्रहार करने वाला कोई आंदोलन नहीं हुआ।” इस प्रकार “महिषासुर आन्दोलन सवर्ण राष्ट्रीयता को चुनौती दे रहा है” (कुमार, अनिल, 2016)।

महिषासुर आंदोलन इसी सांस्कृतिक आंदोलन की जरूरत के तहत शुरू किया गया और आगे बढ़ रहा है। इस आंदोलन के प्रारंभिक अगुआ लोगों ने यह उ्म्मीद की थी कि इस आंदोलन को मनुवाद द्वारा दमित सभी तबके अपनायेंगे। जिस दलित, आदिवासी, ओबीसी और महिलाएं शामिल हैं। यह उम्मीद एक हद तक पूरी भी होती दिख रही है। एक शोधार्थी के रूप में मैंने देखा है कि इस आंदोलन का उद्देश्य अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग था। सभी ने आंदोलन को अपने-अपने तरीके से अपनाया। आज यह आंदोलन आदिवासी समुदायों में अपना आधार बना रहा है, जहां महिषासुर की स्मृतियां निरंतर जीवन्त बनी रही हैं। दिशोम गुरू (वैश्विक शिक्षक) के नाम से चर्चित झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का कहना है कि महिषासुर उनके पूर्वज हैं, जबकि यादव समेत अनेक पिछडी-दलित जातियों के लोग भी दावा कर रहे हैं कि महिषासुर उनके राजा थे,पूर्वज थे।

पश्चिम बंगाल के पुरूलिया जिला केकाशीपुर प्रखंड के भालागौड़ा में महिषासुर शहादत दिवस पर विशाल आयोजन होता है। इस वर्ष यहां इस आयोजन के लिए लगभग 20 हजार लोग जुटे, जिनमें मुख्य रूप से संताल, बावरी, राजहड, महाली आदि आदिवासी जातियों व पिछड़े-दलित तबकों के लोग थे। यहां यह आयोजन चरियन महतो के नेतृत्व में होता है। कुर्मी जाति से आने वाले महतो यह आयोजन न सिर्फ यहां करते हैं, बल्कि उन्होंने कई अन्य स्थानों पर भी इस आयोजन के लिए आदिवासियों को प्रेरित किया है। वे बताते हैं कि कुर्मी व इस तरह की अन्य अन्न उत्पादक व पशुपालक जातियों की जडें आदिवासी समाज में ही रही हैं, यह कारण है कि हम महिषासुर से गहरा अपनत्व महसूस करते हैं। फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित ‘बुंदेलखंड में महिषासुर, बड़ा देव और मैर बाबा की परम्पराएं’ में लेखक सुरेश प्रसाद अहिरवार कहते हैं – ‘प्राचीन काल से ही बुदेलखंड के गांवों में महिषासुर की पूजा की जाती रही है। हमारा गांव इसका साक्षी रहा है। हमारे गांव में अहीर और अहिरवार (देश के कई हिस्‍सों में यह जाति चर्मकार, मोची आदि नामों से भी जानी जाती है) दोनों जाति के लोग मिलकर महिषासुर की पूजा करते हैं। गाँव वाले महिषासुर को ‘भैंसासुर’ के नाम से पुकारते हैं।’ मामला सिर्फ अनुसूचित जाति और जनजाति तक ही सीमित नहीं है। ई.ए.एच ब्लंट लिखते हैं कि राजपूतों की एक जाति महिषासुर राक्षस या भैंसासुर की पूजा करती है ( ब्लंट, 1969)। दरअसल, यह कन्हपुरिया नामक जाति है, जाे अन्य अनेक जातियों की भांति क्षत्रीय/राजपूत होने का दावा करती है। इस जाति की आबादी मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ, रायबरेली, सुल्तानपुर तथा बिहार के मोतीहारी जिले में है। इससे यह पता लगता है कि इस पंरपरा का सामजिक दायरा अनेक अद्विज जातियों में फैला हुआ है। जैसा कि, बिहार के मुजफ्फरपुर के सिंकंदरपुर कुंडल में महिषासुर दिवस के आयोजक एकलव्य सेना के नरेश कुमार सहनी कहते हैं कि ” ”हम निषादों (मल्लाहों) की एक उपजाति है – महिषी। यह निषादों की वह उपजाति है जो पशुपालन करती है। महिषासुर हम मल्लाहों के पूर्वज थे। ‘साथ ही, वे स्वयं ही जोड़ते हैं कि ”महिषासुर जिस काल में रहे होंगे, उस समय जाति व्यवस्था इस रूप में नहीं रही होगी, इसलिए उनकी जाति नहीं निर्धारित की जा सकती। यादव व अन्य जातियां भी उन्हें अपना पूर्वज मानती हैं। सभी अपने जगह सही हैं।’’( महिषासुर, एक जननायक 2016)

हाल के दिनों में आदिवासी समाज के भीतर महिषासुर आंदोलन की पैठ काफी बढ़ी है। इसने आदिवासियों को मनोवैज्ञानिक तौर पर सशक्त बनाया है। वे अपने महान और उदार राज पर गर्व करते हैं। इस माध्यम से अपने गौरवपूर्ण अतीत को भी याद करते हैं। (सोरेन : 2012, पंकज : 2012, रंजन : 2015, असुर : 2016)। यादव भी उनसे अपना रिश्ता जोड़ रहा है (महिषासुर : 2014, यादव : 2013 से पुनर्प्रकाशित)।

किसी के मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि महिषासुर इतनी सारी जातियोंं और समुुदायों के एक साथ कैसे पूर्वज हो सकते हैं? सच बात तो यह प्रश्न ही, उस जमीन से पैदा होता है कि वर्ण/जातियां अनन्तकाल से हैं, ईश्वर की पैदाइश हैं, मनुष्य जाति के उद्भव के साथ पैदा हुई हैं। जबकि सच्चाई यह है कि वर्ण/ जातियां आर्यों-ब्राह्मणवादियों ने यहां के बहुजनों (प्राचीन निवासियों पर थोपा)। इस देश में हजारों वर्षों तक यहां के प्राचीन निवासियों की एक ऐसी उन्नत सभ्यता और संस्कृति रही है, जिसमें वर्णों/ जातियों के लिए कोई स्थान नहीं था। इन्हें डॉ. आंबेडकर असुर और नाग कहा है। जिनका बाद में भाषायी नाम द्रविड़ पड़ा। ये सभी एक ही वंश परंपरा को लोग थे। जिन पर बाद में आर्यों/ ब्राह्मणवादियों ने अपनी जीवन-पद्धति, संस्कृति और सभ्यता थोपने की कोशिश की। भयानक संघर्ष हुुआ। वे इसी संघर्ष को हिंदुओं के मिथक असुरों और देवताओं, राक्षसों और हिंदुओं के भगवानों और दैत्यों और भगवानों की पत्नियों के बीच दिखाते हैं। इस संघर्ष में एक हिस्से ने पराजय नहीं स्वीकार किया, जिन्हें आज हम आदिवासियों के रूप में जानते हैं। एक अन्य हिस्से ने भले ही राजनीतिक और आर्थिक प्रभुत्व स्वीकार कर लिया हो, लेकिन सांस्कृतिक प्रभुत्व स्वीकार नहीं किया, किसी न किसी रूप में वे अपने संस्कृति को जिंदा रखा । एक हिस्से ने सांस्कृतिक प्रभुत्व को भी स्वीकार कर लिया, लेकिन पुरानी संस्कृति के भी अवशेष कायम रहे। आज ये तीनों हिस्से अपनी वंशावली की तलाश कर रहे हैं और इस तलाश में उनके साझे पूर्वज के रूप में महिषासुर सामने आ रहे हैं।

इस आंदोलन ने दो तरह की प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया है। जहां एक ओर इस सांस्कृतिक आंदोलन के माध्यम से मनुवादी-ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक अधीनता के शिकार तबके अपनी खोई हुई सांस्कृतिक पहचान को पाने की कोशिश कर रहे हैं। तो दूसरी ओर, अब तक अपना सांस्कृतिक वर्चस्व बनाए रखने वाले ब्राह्मणवादी तबकों में बौखलाहट है। इस बौखलाहट की पहली तीखी अभिव्यक्ति संसद में (फ़रवरी, 2016) हुई थी। अब ऐसे आदिवासी-बहुजन लोगों पर मुकदमे ठोंके जा रहे हैं, उन्हे गिरफ्तार किया जा रहा है, जो महिषासुर को खुलेआम नायक घोषित करते हैं या महिषासुर जयंती/ शहादत दिवस मनाते हैं। भले ही द्विज समाज के भीतर महिषासुर को नायक मानने को लेकर बौखलाहट हो, लेकिन इस समाज के भीतर भी इस आंदोलन ने एक सकारात्मक असर यह डाला है कि उस समाज के कुछ लोग भी सोचने लगे हैं कि क्या किसी की हत्या (महिषासुर की दुर्गा द्वारा हत्या) का जश्न मनाना मानवीय व्यवहार कहा जा सकता है?

हम कह सकते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में एक सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में महिषासुर आंदोलन का तेजी से विस्तार हुुआ है। उत्तर भारत के विभिन्न उच्च संस्थानों व अनेक शहरों, कस्बों में छोटे-छोटे समूह “महिषासुर दिवस” का आयोजन कर रहे हैं। इसे आसानी से महसूस किया जा सकता है कि यह भारत के बहुजनों के एक सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले रहा है। यह उन तबकों के त्यौहार का रूप भी ले रहा है, जो हजारों वर्षों से सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से दमित रहे हैं।

महिषासुर आंदोलन और पहचान का प्रश्न

महिषासुर आंदोलन को पहचान के प्रश्न के साथ जोड़ कर देखा जा सकता है। इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों संदर्भ हैं। इस संदर्भ में कुछ प्रश्न उठते हैं पहला प्रश्न तो यह कि पहचान का मतलब क्या है? दूसरा यह कि पहचान के प्रश्न के साथ महिषासुर आंदोलन का क्या रिश्ता है? तीसरी बात यह कि कुछ लोग पहचान की राजनीति को नकारात्मक रूप में क्यों प्रस्तुत करते हैं?

क्या महिषासुर आंदोलन नई पहचान की खोज कर रहा है, क्या वह इसके माध्यम से नई पहचान बनाना चाहता है, अथवा बहुजनों की खोई पहचान हासिल करना चाहता है, अथवा वह अपनी सांस्कृतिक जड़ों की खोज कर रहा है? इसके साथ ही यह स्वाभाविक जिज्ञासा का प्रश्न है कि कोई आज के आधुनिक युग या यहां तक कि उत्तर आधुनिक कहे जाने वाले युग में क्यों अपनी पहचान की खोज कर रहा है या मांग क्यों कर रहा है? यहां यह भी स्वभाविक प्रश्न है कि कोई आधुनिक भारत में सदियों पुराने प्रश्न को क्यों हल करना चाहता है? इस बात को भी चिन्हित किया जाना जरूरी है कि महिषासुर का प्रश्न पूरे भारत का प्रश्न है या किसी खास समुदाय का? इसके साथ ही कुछ अन्य प्रश्न भी इस संदर्भ में सामने आते हैं। क्या पहचान का प्रश्न और पहचान की राजनीति एक ही पदबंध हैं या भिन्न-भिन्न अर्थ देते हैं। इन्हीं सभी प्रश्नों के उत्तरों में जाने का मेरा मुख्य सरोकार महिषासुर आंदोलन की गतिकी को समझना है।


महिषासुर शहादत दिवस के मौके पर बिहार की राजधानी पटना में प्रदर्शन करते बिहार अर्जक संघ के सदस्य

सबसे पहली बात जो इस पूरे संदर्भ में ध्यान रखने की है, वह यह कि मनुष्य एक व्यक्ति, समुदाय, वर्ग, क्षेत्र, भाषा-भाषी समूह, धर्म, सांस्कृतिक समूह, लिंग, प्रजातीय, सजातीय, भारत में जाति इत्यादि आधारों पर अपनी पहचान की तलाश में रहता है। सच्चाई तो यह है कि सामाजिक प्राणी के रूप में व्यक्ति का अस्तित्व उसकी पहचान से जुृृड़ा हुआ है। आम जीवन में भी यह स्वीकृत सी धारणा है कि जिसकी अपनी खुद की पहचान नहीं है उसका कोई अस्तित्व नहीं है, भले ही वह भौतिक तौर पर जीवित हो। इसका कारण यह है कि जीवित रहने की बुनियादी आवश्यकताएंं प्राणी मात्र की होती हैं। व्यक्ति या समूह के सदस्य के रूप में खुद की पहचान की चाह ही इंसान को इंसान बनाती है। यह मानवीय प्रकृति का हिस्सा है। आदिम काल से मनुष्य ‘मैं’ या ‘हम’ कौन हैं, इन प्रश्नों से जूझता रहा है। पहचान का प्रश्न सभी समाजों का प्रश्न रहा है। यहीं पर एक बात को रेखांकित कर लिया जाना चाहिए कि पहचानों को मिटाया भी जाता रहा है। एक व्यक्ति, समुदाय, वर्ग, भाषा-भाषी समूह, सांस्कृतिक समूह अथवा राष्ट्र दूसरों की पहचान मिटा कर ही उन पर अपना वर्चस्व कायम करता है, और इस वर्चस्व को बनाए रख सकता है। इसके विपरीत जो वर्चस्व से मु्क्ति चाहता है, उसे अपने खोई पहचान की तलाश करनी पड़ती है या नई पहचान कायम करनी पड़ती है। वर्चस्वशाली समुदायों और उनके अधीन रहने वाले समुदायों दोनों के लिए पहचान का प्रश्न अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है।

वे कौन लोग हैं जो पहचान की राजनीति को नकारात्मक अर्थ में देखते हैं? भारत में पहचान की राजनीति को राष्ट्र विरोधी गतिविधि के रूप में भी देखा जाता है। यहां बुुद्धिजीवियों की एक जमात है, जो पहचान की राजनीति को हमेशा देश और राष्ट्र को तोड़ने वाला कहती है। मैं समझता हूं कि इसे नकारात्मक मानने की जड़ में यह बात निहित है कि पहचान की हर आवाज ‘स्थापित सामाजिक संरचना’ पर प्रहार करती है और यह कार्यवाही उस ‘राष्ट्रीय मुख्य धारा के खिलाफ जाती है, जिसने इतर पहचानों का विध्वंस करके या उन्हें दमित करके अपना वर्चस्व कायम कर रखा है। पहचान की राजनीति ‘स्थापित राष्ट्रीयता’ के नाम पर किसी विशेष राष्ट्रीयता को चुनौती देती हैं। इसे मैं ‘विशेष स्थापित राष्ट्रीयता’ का नाम देता हूं। यहां भी राष्ट्रीयता से मेरा मतलब भौगोलिक इकाई से नहीं हैं, बल्कि उन विशिष्ट पहचानों से है, जो किसी समुदाय के एकरूप महसूस करने का कारण बनती है। इस आधार पर भारत में कई राष्ट्रीयताएं है, कुछ प्रबल और प्रभावी हैं, तो कुछ गौण या कमजोर हैं। प्रबल और प्रभावी राष्ट्रीयता में से कुछ, समय के साथ ‘प्रभुत्वशाली राष्ट्रीयता’ बन जाती हैं और कुछ “अधीनस्थ, गौण या वंचित राष्ट्रीयता” बन जाती हैं। यह ‘प्रभुत्वशाली राष्ट्रीयताएं’ “अधीनस्थ, गौण या वंचित राष्ट्रीयता” को कुचलती हैं या कुचलने की कोशिश करती हैं। इस प्रक्रिया में “प्रभुत्वशाली समुदाय और वर्ग” अपनी पहचान को दूसरों पर थोप देते हैं। पहचान को थोपने का दायरा अत्यन्त विस्तृत होता है। प्रभुत्वशाली पहचान वाले समूह न केवल अपनी जीवन-पद्धति अधीनस्थ समूहों पर लादते हैं, अपनी संपूर्ण संस्कृति भी थोपना चाहते हैं। यहां तक कि वे यह भी चाहते हैं कि अधीनस्थ किये गए समूह उनके अनुसार सोचें। अधीनस्थ किेए गए समूह वर्चस्वशाली समूह से कोई प्रश्न नहीं पूछ सकते, उनके ऊपर कोई सवाल नहीं उठा सकते। उनकी जीवन पद्धति को चुनौती देने को कौन कहे, यहां तक कि वे उसमें कोई संशोधन या परिष्कार नहीं कर सकते हैं। उनकी अधीनता स्वीकार करके भी वे उनके समान नहीं माने जाते, दोयम दर्जे का ही माने जाते हैं। वे उनके साथ घुलमिल भी नहीं सकते हैं। उनके साथ बाहरी जैसा ही व्यवहार किया जाता है।

प्रभुत्वशाली पहचान की अधीनता में जीने वालों के बीच के, रिश्ते की उपर्युक्त संरचना पूरी तरह से आर्य/ब्राह्मणवादी पहचान और अनार्यों/गैर सवर्णों के रिश्तों पर लागू होती है। आज भी ब्राहमणवादी पहचान गैर-दविजों को पिछड़े, असभ्य, आदिम सामाजिक अवस्था वाले, असामाजिक, विजातीय संस्कृति, व्यवस्था-विरोधी और यहां तक कि द्रेशद्रोही भी कहा जाता है। भले ही इनके बड़े हिस्से ने द्विजों की दी गई पहचान को अपनी पहचान बना लिया हो। मैं इसी लिए गैर-दविजों को ‘सांस्कृतिक गुलाम’ कहता हूं। गैर-सवर्णों या गैर-दविजों ने धीरे-धीरे अपनी पहचान खो कर, इनकी पहचान को अपनी पहचान बना लिया, उसके बाद भी वे लोग बाहरी ही बने रहे। हम यहां उनकी बात नहीं कर रहे हैं, जिन्होंने कभी अपनी पहचान को नहीं खोया, सांस्कृतिक अधीनता नहीं स्वीकारी ।

महिषासुर आंदोलन इसी प्रभुत्वशाली पहचान, राष्ट्रीयता और संस्कृति को चुनौती दे रहा है। भारत के राजनीतिक लोकतांत्रिकरण, वंचित तबकों के सापेक्षिक तौर पर सशक्तीकरण और शिक्षा के फैलाव ने वह परिस्थितियां पैदा की हैं, जिसमें वैकल्पिक चेतना से लैस लोग अपनी जड़ों की खोज कर रहे हैं, अपने पहचान की तलाश कर रहे हैं। महिषासुर जड़ों की खोज और पहचान का सबसे बड़ा प्रतीक बनकर सामने आया है। जैसा कि हम पहले कह चुके हैं कि महिषासुर एक प्रतिमान है। महिषासुर इस पहचान का प्रतीक बन चुका है। इस तरह की परिस्थितियां और चेतनायें निर्मित हुुई हैं, जिसमें हाशिए के तबके केंद्र में आकर चुनौती पेश कर रहे हैं, अपनी पहचान की खोज कर रहे हैं। संचार माध्यमों के तेजी से प्रसार ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है। अब हाशिए के लोगों की पहचान की खोज को खारिज करना आसान नहीं रह गया है। उनकी आवाज को अनसुना करना या दबाना भी मुश्किल होता जा रहा है। “वर्चस्वशाली समुदायों” को झुकना पड़ रहा है, वे महिषासुर आंदोलन के स्वरों को भी सुनने को मजबूर हु्ए हैं। भले वे इसे हृदय से स्वीकार न कर पाए हों। महिषासुर की स्वीकृति जितनी बढ़ेगी, उसी अनुपात में ब्राह्मणवादी पहचान खारिज होगी, द्विज पहचान को चुनौती मिलेगी।

किसी समुदाय की पहचान कायम करने में अतीत के नायकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ब्राह्मणवादी संस्कृति ने महिषासुर को दैत्य-राक्षस कह कर अपमानित और लांक्षित करने की कोशिश की। लेकिन यह व्यवहार केवल महिषासुर तक सीमित नहीं था। बहुजनों के जिन नायकों के स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण हैं उनको भी अपमानित और लांक्षित किया जाता रहा है। इसमें बु्द्ध, मौर्य वंश, सम्राट अशोक जैसे लोग शामिल हैं। आज वह वर्ग जाग रहा है, जिनके नायकों को इतिहास के कूड़ेदान में फेंकने की कोशिश की गई। यह वर्ग वर्चस्वशाली तबकों से प्राप्त अपनी पहचान को छोड़कर अपनी खुद की पहचान को नए सिरे से खोजना और पुनर्स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। इसके साथ वर्चस्वशाली पहचानों पर हमला भी बोल रहा है। जैसा कि नैंसी फ्रेसर (1996) ने लिखा है कि “पहचान की राजनीति-सांस्कृतिक पहचान पर हमला करती है, जिसके बारे में परिकल्पना की जाती है कि समाज में भागीदारी – व्याख्या और संपर्क के सामाजिक प्रतिमान से जुड़ा है”। नैंसी फ्रेसर इस बात पर जोर देती हैं कि “पहचान की राजनीति में पीड़ित के साथ अन्याय, मार्क्स या बेबर के वर्ग सिद्धांत से ज्यादा “प्रतिष्ठा समूह” के सिद्धांत से ज्यादा जुड़ा है। प्रतिष्ठा समूह का सिद्धांत खुद मैक्स बेबर का ही दिया हुआ है”। यह उत्पादन की प्रक्रिया में भागीदारी से नहीं पहचान के साथ जुड़ा हुआ है।

पहचान की खोज के साथ ही पहचान की राजनीति का प्रश्न भी सामने आता है। पहचान की खोज और राजनीति बिल्कुल जुदा-जुदा चीज़े नहीं हैं। इसी को सूत्रबद्ध करते हुए फोर्ड (2005) लिखते हैं कि “पहचान की राजनीति नई नहीं है…सभी राजनीति पहचान है, और सभी पहचान राजनीति है।” अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं कि “जब हम ‘पहचान की राजनीति’ बात कर रहे होते हैं तो हम उनकी बात नहीं कर रहे होते हैं, जो अपने राजनीतिक दल में सक्रिय रहते हैं। … पहचान की राजनीति सामाजिक पहचान से निर्मित होती है, जो पहले से निर्धारित होती है। इससे संकेत मिलता है कि (सामाजिक-सांस्कृतिक) पहचान, (समाज में) राजनीति से पहले आती है, हम पहले पहचान से शुरू करते हैं। जिसका स्वरूप और प्रकृति पूर्व-राजनीतिक होती है। इसेक बाद ही हम राजनीतिक होते है।”

एक खास शब्दावली के संदर्भ में भले महिषासुर आंदोलन को पहचान की राजनीति के साथ जोड़ लिया जाय, लेकिन इसकी प्रत्यक्ष तौर पर राजनीति में कोई दखलंदाजी नहीं है। यह पारिभाषिक अर्थों में प्रत्यक्ष तौर पर राजनीतिक आंदोलन नहीं हैं, लेकिन यह राजनीति को गहरे अर्थों में प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इस कारण यह है कि भारतीय राजनीति गहरे अर्थों में एक सांस्कृतिक राजनीति भी है। यह अकारण नहीं है कि जिन समुदायों का सांस्कृतिक वर्चस्व है, उन्हीं का राजनीतिक वर्चस्व भी है, भले ही इसे चुनौती मिल रही हो। यहां फोर्ड की पहचान की राजनीति के सिद्धांत के आलोक में यह याद रखना जरूरी है कि किसी समुदाय विशेष का सदस्य होने मात्र से कोई व्यक्ति उस समुदाय की पहचान की राजनीति कर रहा है, यह नहीं कहा जा सकता है। कोई व्यक्ति विशेष वर्चस्वशाली पहचान को स्वीकार कर भी राजनीति कर सकता है। विभिन्न ब्राह्मणवादी पार्टियों में शामिल बहुजनों से इस बात को भारत के संदर्भ में अच्छी तरह समझा जा सकता है। इसके साथ यहां यह भी कहना जरूरी है कि भारत में यदि कोई व्यक्ति या पार्टी सांस्कृतिक वर्चस्व या प्रभुत्वशाली पहचान को चुनौती नहीं देता है, तो वह मूलतः प्रभुत्वशाली पहचान की ही राजनीति कर रही है। इस विडंबनापूर्ण स्थिति को तभी तोड़ा जा सकता है, जब वर्चस्व की जड़ पर चोट की जाय। महिषासुर आंदोलन वर्चस्व की जड़ को ही चुनौती दे रहा है।

जब कोई समुदाय यह प्रश्न खुद से पूछ रहा होता है कि “मैं कौन हूं” तो उसका जोर अपने “सांस्कृतिक-सामाजिक अस्तित्व की पहचान” पर होता है। यह पहचान “उस समुदाय के व्यक्तियों और समूह का दूसरे समुदाय के व्यक्तियों या समूह से भिन्नता को प्रदर्शित करता है” (जेनकिंसः1996, उद्धृत फेयरानः 1999)। मैं यह जोर देकर कहना चाहूंगा कि “सभी पहचान सामाजिक हैं और सामाजिक पहचान निर्मित की जाती है। इसे प्रतिदिन के जीवन में स्थापित और दर्शाया जाता है” (इर्विन गौफमैन 1956/1959)। इन सिद्धांतों के आलोक में जब महिषासुर आंदोलन को देखते हैं तो पाते हैं कि महिषासुर आंदोलन भारत के बहुजनों की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान को ढूंढ भी रहा है और उसे स्थापित भी कर रहा है। इस प्रक्रिया में वह अपनी सांस्कृतिक जड़ों की तलाश कर रहा है। अपनी खोयी पहचान को वापस पाने की कोशि्श कर रहा है। इसी सिलसिले में कोई अकादमिक अध्ययन भी कर रहा है – यह वर्चस्व से मुक्ति पाने की अनिवार्य शर्त है।

महिषासुर आंदोलन इस बात को बखूबी समझता है कि एक बार यदि बहुजन समाज ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक वर्चस्व से मुक्त हो जाय तो, वह अपने को अन्य वर्चस्वों से मुक्त कर लेगा। वर्चस्व से मुक्ति के लिए जरूरी है कि वर्चस्वशालियों द्वारा दी गई, पहचान के बरक्स अपनी पहचान की खोज करे। क्योंकि दूसरों से प्रदत्त पहचान की स्वीकृति अधीनता को जन्म देती है और अधीनता से मुक्ति अपनी पहचान कायम करके ही हो सकती है, लेकिन वास्तविक पहचान गढ़ी नहीं जाती है, वह समुदाय की सांस्कृतिक जड़ों से थिरा-थिरा कर बनती है। कोई समुदाय यदि अपनी नकली पहचान या कृत्रिम पहचान से मुक्त होना चाहता है, (सर्वव्यापी अधीनता से मुक्ति के लिए यह जरूरी है) तो उसे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ना ही होगा, अपनी वास्तविक पहचान की तलाश करनी ही होगी। महिषासुर आंदोलन महिषासुर के प्रतिमान के माध्यम से अपनी इसी पहचान को नए सिरे से पुनर्स्थापित करना चाहता है। ताकि वर्चस्व के सभी रूपों से बहुजनों को मुक्ति मिल सके।

जहां तक इस प्रश्न का सवाल है कि आधुनिक युग या उत्तर आधुनिक युग में पहचान कीे खोज के क्या मायने हैं? इस संदर्भ में इतना ही याद दिलाना पर्याप्त होगा कि उत्पादन की पद्धति या अन्य तकनीकी मामलों में भारत चाहे जितना आधुनिक हो गया हो, शासन की पद्धति के तौर पर भले ही उसने आधुनिक लोकतांत्रिक शासन पद्धति को स्वीकार कर लिया हो, अकादमिक विमर्श के स्तर पर भले ही वह उत्तर आधुनिक हो गया हो, लेकिन जब समाज और उसके अन्तर्य को निर्धारित करने वाली संस्कृति का प्रश्न आता है, तो भारत मध्ययुगीन ही नहीं बर्बर दिखता है। यहां बर्बरता की संस्कृति का वर्चस्व है, इस संस्कृति का मूल आधार और मूल्य बोध बर्बरता हैं, मनुष्यों के वृहत्तर समुदाय बहुजनों के प्रति घृणा पर ही ब्राह्मणवादी संस्कृति टिकी हुई है। इन बहुजनों में आदिवासी, दलित, ओबीसी तो शामिल ही हैं, महिलाएं भी इसका हिस्सा हैं, क्योंकि महिलाओं को भी देने के लिए इस संस्कृति के पास केवल घृणा है। बहुजन की इस अवधारणा में व्यापक तबके समाहित हैं। इन बहुजनों को वंचित तबकों के रूप में भी चिन्हित किया जा सकता है, “आज के भारतीय परिप्रेक्ष्य में प्रमुख वंचित तबके हैं – स्त्रियां, अनुसूचित जातियां, अनुसूचित जनजातियां, अन्य पिछड़ा वर्ग, विमुक्त घूमंतू जातियां और सभी पसमांदा धार्मिक अल्पसंख्यक” (प्रमोद रंजन: 2016)।



महिषासुर आंदोलन का अध्ययन करते हुए, मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि महिषासुर आंदोलन अपनी “पहचान की जड़ों” को खोज कर बहुजनों की वर्तमान सामाजिक स्थिति और संरचना को समझना रहा है, साथ ही इसके माध्यम से वर्तमान सामाजिक संरचना और प्रभुत्व को चुनौती दे रहा है। इस संदर्भ में मैं गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक (1988 271-73) सहमत हूं कि “पहचान की राजनीति वहां तक जाती है, जहां कोई विशेष समूह तिरस्कृत और शोषित महसूस करता है।” इन अर्थों में महिषासुर आंदोलन एक राजनीति आंदोलन भी है, क्योंकि हम सभी जानते हैं कि किसी भी सांस्कृतिक आंदोलन की एक राजनीति होती है और साथ ही राजनीति शास्त्र के एक विद्यार्थी के तौर भी मेरे मन में प्रश्न उठता है कि राजनीति से बाहर क्या है?



निष्कर्ष यह है कि महिषासुर परिघटना का जन्म “सांस्कृतिक उपनिवेश” और “हिंसात्मक सांस्कृतिक प्रदर्शन” के खिलाफ हुुआ है। भारत में यह सांस्कृतिक उपनिवेश ब्राह्मणवादी संस्कृति के रूप में है और इस उपनिवेश के शिकार बहुजन हैं। बहुजन इस उपनिवेश को चुनौती दे रहे हैं। इस चुनौती के परिणाम भी आने लगे हैं। इसी तथ्य को रेखांकित करते हुए ब्रजरंजन मणि कहते हैं कि “ऐतिहासिक वर्चस्व, ज्ञान और शक्ति का कुटिल गठबंधन तेजी से टूट रहा है (2005/ 2015)। महिषासुर आंदोलन सांस्कृतिक वर्चस्व को तोड़ने की परिघटना के रूप में उभरा और विस्तारित हो रहा है। जैसे-जैसे बहुजन समाज ब्राह्मणवादी संस्कृति से मुक्त होता जायेगा, वह अपने को उनके अार्थिक, सामाजिक और राजनीतिक वर्चस्व से भी मुक्त कर लेगा।

सन्दर्भ :

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साहित्य और जनजीवन में असुर परंपराएं

असुर परम्पराओं में कथित तौर पर देवताओं के साथ युद्ध को कई रूपों में दर्शाया गया है। इनका जिक्र साहित्य में भी किया गया है। हाल के वर्षों में मुख्यधारा के साहित्य ने भी अपने रुख में बदलाव किया है। अब असुर परम्पराओं को जगह दिया जाने लगा है। इस बारे में विश्लेषण कर रहे हैं हरेराम सिंह


जैसा कि हम जानते हैं कि पौराणिक साहित्य में असुरों को खलनायकों की भांति दिखाया गया है, लेकिन अन्य साहित्यिक, ऐतिहासिक स्रोत पुराणों के इस दावे के खिलाफ खडे हैं। दरअसल, हिंदू धर्म ग्रंथ सभी ब्राह्मणेत्तर संस्कृतियों के खिलाफ मुहिम के रूप में लिखे गए हैं। मसलन, हम देखते हैं कि बिहार के इतिहासकार डा. कौलेश्वर राय बक्सर की ताड़कासुर को यक्षिणी के रूप में मान्यता देते हैं और यक्ष-यक्षिणियाँ बौद्ध धम्म से गहरे रूप में जुड़ी हुई हैं। प्राचीन मंदिरों की दीवारों पर वे आज भी शोभा बढ़ा रही हैं।


महाराष्ट्र में शिर्डी के नजदीक वैजापुर में म्हसोबा का मंदिर। इस मंदिर के पुजारी तेली जाति के हैं। संयोग से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जाति भी यही है। (फोटो : एफपी ऑन द रोड)
दूसरी ओर हम राम के हाथों ताड़कासुर के वध की घटना को ‘रामचरित मानस’ में तुलसीदास के शब्दों में देखें :
‘‘चले जात मुनि दीन्हि देखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई।।
एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा।।
सुनि मारीच निसाचर क्रोधी। लै सहाय धावा मुनि द्रोही।।
बिनुफर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा।।
पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु संघारा।।
मारि असुर द्विज निर्भयकारी। अस्तुति करहिं देव मुनी झारी।।’’


वैजापुर में म्हसोबा चौक : तेली व अन्य पिछड़ी जातियों के लोग म्हसोबा को अपने गाँव के रक्षक के रूप में मानते हैं। (फोटो : एफपी ऑन द रोड)

सवाल यह उठता है कि आखिर द्विजों को ताड़का, मारीच और सुबाहु जैसे असुरों से इतना भय क्यों था, जिसका जिक्र तुलसीदास ने अपनी उपरोक्त काव्य पंक्तियों में किया है? और असुर इनके शत्रु कैसे हो गये? मार्क्सवादी दृष्टिकोण से देखें तो इसका जरूर आर्थिक संबंध रहा होगा। असुरों की सत्ता एवं संपत्ति दोनों हड़पी जा चुकी थी, इनके द्वारा और वे असुर समय-समय पर अपनी शक्तियां बटोरकर अपनी मान-सम्मान की वापसी के लिए, अपने विकास के लिए इनपर हमला करते होंगे। देवों और असुरों के बीच हजारों वर्षों से लड़ी जाने वाली लड़ाईयां दो भिन्न संस्कृतियों, परंपराओं, मान्यताओं की लड़ाई थी, जिसमें असुरों को भारी आर्थिक क्षति सहनी पड़ी।

असुर भूमि उडीसा

उड़ीसा को असुरों की भूमि तो कहीं अनार्यो की भूमि के रूप में चित्रित किया गया है। डॅा. पूर्णिमा केडिया ‘ओड़िया साहित्य का इतिहास’ में लिखती हैं- ‘‘सातवीं-आठवीं शताब्दी तक उड़ीसा में भौमों के शासन काल में बौद्ध कला और कविता का प्रसार होता रहा है। उसके बाद सोमा वंश के ययाति-केसरी ने वैदिक धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए कान्यकुन्ज (कन्नौज) से हजार ब्राहम्णों को बुलाकर उड़ीसा में बसाया, ऐसा प्रसिद्ध है।’’और आठवीं शताब्दी में शंकराचार्य ने दक्षिण से आकर पूरी को चारों धर्मो में से एक धाम बनाया। ओड़िया भाषा के प्रथम उपन्यासकार फकीर मोहन सेनापति ने ‘छमाण आठगुंड’ में असुरों द्वारा तालाब खोदने की बात की है। असुर वहां के दिग्घी तालाब को रात को कुदाल लेकर खोदते हैं : ‘‘खोदते-खोदते रात बीत गयी थी। दक्खिन वाले कोने में बारह-चौदह हाथ चौड़ा मुहाना-सा एक रही गया, उस पर मिट्टी नहीं डाली जा सकी। गांव में लोगों की हलचल फिर शुरू हो गयी थी, असुर अब जाएँ तो कहां जाएँ? पोखरे के अंदर से ही बिल खोदकर उसी रास्ते गंगा-किनारे पहुंच गये और गंगा-स्नान करने के बाद वहां से भाग गये।’’


कर्नाटक-महाराष्ट्र की सीमा पर हिटनी नामक जगह पर म्हसोबा का मंदिर. यहाँ से हर वर्ष एक विशाल यात्रा निकाली जाती है जिसे म्हसोबा यात्रा कहा जाता है. (फोटो : एफपी ऑन द रोड)

हिन्दी जनमानस जिस तरह देवता-गण शब्द का इस्तेमाल संयुक्त रूप से होते आया है, ठीक उसी तरह भारतीय इतिहास में नागवंशियों की एक शाखा विशेष के लिए असुर-गण शब्द का इस्तेमाल भी होता है। महाभारत में घटोत्कच की राक्षस (असुर) माँ नागवंशी थी। इससे मालूम होता है कि असुर एक जाति थी। उनका संबंध भी सुरों के साथ हुआ।

बिहार में गयासुर और दैत्यरा


बिहार के गया जिला गयासुर नाम के असुर पर ही बना, पौराणिक मान्यता के अनुसार गयासुर को आर्यों के अवतारी देव विष्णु ने शिलपट्ट पर चांप कर मारा। उसे राज्य से बेदखल किया। मतलब सत्ता के लिए खूनी-संघर्ष हुआ था देवों और असुरों के बींच। और द्विज-ब्राहम्ण असुरों को परास्त करने के लिए नए-नए तरीके व तरकीब लड़ाकू आर्यों के कुनबे को बताते थे, क्योंकि वे चालाक थे, सीधे संघर्ष से खुद को बचाते थे।

महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के फुलाम्बरी में म्हसोबा महाराजा संस्थान के द्वारा बनाया गया म्हसोबा स्थान। (फोटो : एफपी ऑन द रोड)

बिहार के कैमूर जिला में कई जगह दैत्यरा (असुर) की मूर्ति की पूजा होती है। किसान वर्गों में यह धारणा है कि दैत्यराज सुदूर खेतों की फसलों की रक्षा करते हैं। इसलिए वे उनकी पूजा करते हैं और काले रंग का धागा भी उनके नाम की कलाइयों पर बांधते हैं। उनका मानना है, दैत्य राज अशुभ से उन्हें बचायेंगे। भारत के विभिन्न हिस्सों में दीपावली के एक दिन पूर्व यम का दिया जलाया जाता है। इसका संबंध भी प्राचीन काल की असुर संस्कृति के अस्तित्व के प्रति स्वीकार-भाव से ही है।

समकालीन साहित्यकार

चर्चित उपन्यासकार राजकुमार राकेश ने महिषासुर और दुर्गा के संबंध में लिखा है कि ‘‘जब दुर्गा पूरे नौ दिन और नौ रातों तक उस महल में मौजूद थी, तो सुरों का टोला उसके गिर्द के जंगलों में भूखा प्यासा छिपा बैठा, दुर्गा के वापस आने का इंतजार कर रहा था। आखिर इतने अर्से से दुर्गा ने छलबल से महिषासुर का कत्ल कर दिया।’’ इस लोमहर्षक कत्ल ने सुरों को बु्रटस बना दिया है, जो धोखे से सीजर की हत्या कर मंच पर अवतरित होता है, अपने गिने चुने अपने ही जैसे मित्रों के बीच विजय घोष करता है। इसीलिए महिषासुर कभी बहुजनों के जेहन में विस्मृत नहीं होते बल्कि समय के साथ और दमकते चले जा रहे हैं। लेखक ब्रजनन्दन वर्मा ने अपने आलेख ‘महिष राज से महिषासुर’ में महिषासुर के राज्य के बारे में लिखा है- ‘‘राज्य में शांति समृद्धि दिन दुगना रात चैगुना बढ़ने लगी। धूर्त व्याकुल हुए परस्पर मिलकर विचारने लगे। बैठकर षडयंत्र करने लगे। कोई युक्ति मिले. अन्त में एक धूर्त ने कहा चलकर दुर्गा को प्रसन्न किया जाय। वह हस्त लाघव की कला जानती है। समस्या का समाधान सहज में कर सकती है।’’


महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के समीप महिषासुर का मंदिर (फोटो : एफपी ऑन द रोड)
दुर्गा-सप्तशती को अंतः साक्ष्य मानने वाले संस्कृत कवि वर्मा ने भी लिखा है कि- ‘‘जिस प्रकार हिरण्यकश्यप, होलिका, बलिराजा, मौर्यवंशीय दश सम्राटों को रावण राक्षस कहा गया है। उसी प्रकार यदुवंश शिरोमणि महिषराज को महिषासुर राक्षस कहकर घृणा द्वेष आदि फैलाया गया। धर्म प्रिय प्रजापालक राजा को राक्षस, असुर, निशाचर आदि कहकर छल कपट से मरवाना ही धूर्तो का कर्म है।’’[vii] वर्मा जी संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे। उनका मानना था कि संस्कृत ग्रंथों की टीका जो भी लिखी गई है, उसमें सही अनुवाद की समस्या है। असुरों को जैसा घृणित प्रचारित किया गया है, वह सही जान नहीं पड़ता।
हिंदी साहित्य की अग्रिम पत्रिकाओं में से एक ‘हंस’ में अपूर्वानन्द ने सवाल उठाया है- ‘‘असुरवाहिनी अगर इतनी दुर्दम्य है तो उसके संहार के लिए स्त्री कैसे उपयुक्त हो सकती है? वह अकेले इतने दुर्द्धर्ष असुरों का एक-एक कर नाश कैसे कर पाएगी?’’[viii] सवाल कुछ क्षण के लिए चौंकाने के लिए काफी है; किंतु ‘विषकन्या’ की अवधारणा और पश्चिमी साहित्य में आई कई स्त्री-पात्रों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाएगा कि स्त्री-पात्र को हम जितना कमजोर समझते हैं, उतना वह होती नहीं, वरना विश्व-साहित्य में हरमासिस, किल्योपैट्रा की एक फरेबी मुस्कान में धर्मगुरू, देवी-देवता के बरसों की साधना-तपस्या को भूलकर उसके वासना सागर में डुबकियां न लगाता! और न ही ज्ञान से सिंचित होने के बावजूद हरमासिस लाखों लोगों की आशाओं पर पानी फेरता। किंतु, दुर्गा और महिषासुर के कथा-पाठ में एक अलग तरह का तरंग है। जिसमें एक स्त्री को सत्ता हथियाने के लिए मैदान में उतारा जाता है।


दैत्य, दानव, राक्षस और असुर में क्या अंतर है? जानिए

श्रीमद भागवद्पुराण के अनुसार श्रस्टी के आदि मे सर्वप्रथम ब्रह्म पैदा हुए जिनसे एक स्त्री पुरुष का जोड़ा युवावस्था मे उतपन्न हुआ. पुरुष को स्वयंभावु मनु तथा स्त्री को सतरूपा कहा गया. इनसे ही श्रस्टी मैथुनी हुयी और यही आदि पुरुष माने गए. स्वयंभावु मनु सतरूपा से दो पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद तथा आकुति देवहती और प्रसूति तीन पुत्रियां हुयी.

ब्रह्मा जी के शरीर के भिन्न भागो से अनेक पुत्र पैदा हुए जिनमे मनु सतरूपा से अलग मारीच अत्रि अंगिरा पुलह पुलस्त्य क्रतु दक्ष, रूद्र भृगु वशिष्ठ कर्दम अथरवा रूचि धर्म नारद आदि हुए.

इन ब्रह्म पूतरो ने स्वयंभवु मनु क़ी पुत्रियों से विवाह किया. ब्रह्म पुत्र मारीचि के उसकी स्त्री कला से कश्यप और पूर्णिमा नामक पुत्र हुए. कश्यप का विवाह दक्ष प्रजापति ब्राह्मपुत्र क़ी तेरह कन्याओं से हुआ जिनमे दिति, अदिति, दनु, कष्ठा, अरिस्टा सुरसा इला मुनि करोधवषा ताम्रा सुरमा सुरभि और तिमि शामिल है.

ये कश्यप ऋषि और यह तेरह दक्ष प्रजापति क़ी कन्यायें ही अधिकतर श्रस्टी के जनक है. इनसे ही

कश्यप और मुनि से अप्सरा

कश्यप और सुरसा से राक्षस

कश्यप और अरिष्टा से गंदर्भ

कश्यप और दनु से बलशाली 61 दानव पुत्र हुए. यह शैव परम्परा को मानते थे. अस्त्र शस्त्र के अविष्करक और निर्माता थे. त्रिपुराधीपति दानवराज मय बडे ज्ञानी और शिल्प कला के ज्ञाता थे. मायाव कला /विद्या के ज्ञाता थे. मय क़ी. पत्नी हेमा का अपहरण इंद्र ने किया . रावण ने मय क़ी मदद क़ी. रावण राक्षस था. रावन्ने रक्ष संस्कृति विकसित क़ी अर्थात जो रक्षा करें वह राक्षस.

यक्ष संस्कृति के पोषक कुबेर थे जो रावण के सौतेले बडे भाई थे. यक्ष जो लॉग भोग विलास मे अधिक विश्वास रखें यक्ष है. जो तप सुर संयम मे विश्वास रखें वक्ष संस्कृति के पोषक राक्षस है. कुबेर के पिता और रावण के पिता ऋषि विशर्वा थे. माता अलग थी.

कश्यप और दिति से दैत्य जिनमे दैत्यराज हरिण्यकश्यप और हरिन्याक्ष शामिल है. इनके अलावा 49 पुत्र और भी थे जो ब्रह्मचारी रहे और मरूंदड कहे गए. सभी निःसंतान थे. हरिण्यकश्यप को उसकी स्त्री जाम्भोजी क़ी पुत्री दानवी से चार पुत्र और एक पुत्री हियी. प्रहलाद भी इसका ही पुत्र था. प्रहलाद के विरोचन, विरोचन के राजा बलि हिये. राजा बलि से ही विष्णु ने बोन का रूप धरकर छल कोयन और तीन पग भूमि मांग लि. बलि को पाताल लोक का राज दिया गया. वह प्रजापलक और बडे सांयमि ज्ञानी रजा हुए.

कश्यप और अदिति से आदित्य आदि हिये.

कश्यप और दनु के पुत्र वैश्वनर के उपदानवि, हायशिरा, पुलोमा और कालका चार पुत्रियों से दैत्य हिरण्याक्ष, क्रतु, तथा पुलोमा और कालका से कशयप ऋषि ने विवाह किया. यह कश्यप ही इन लड़क़ीयों के पिता का पिता था. पुलोमा से बलशाली पुलोमी और कालका से कालकेय दानव पैदा हुए. इनको निवातकवच भी कहा गया है.

अतः दैत्य दानव राक्षस और असुर क़ी उत्पत्ति मे अंतर है. सबके माता अलग अलग है. असुर, दानव, दैत्य आदि सभी एक दूसरे के सहयोगी थे और सुर या आदित्यों या देवों के गजर विरोधी थे. इनका संघर्ष एक दूसरे पर अधिपत्य हेतु लगातार चलता रहता था.

क्या अंतर है असुर, राक्षस, यक्ष, दैत्य, दानव में ? | Difference Between  Rakshasa, Yakshas, ASURS - YouTube

असुर शब्द का अर्थ है प्राण वाला अथवा शक्तिवान. असुर सुर के धुर विरोधी थे. रामायण काल तथाहाभारत काल मे भी असुरों का वर्णन है. पूतना, गाढ़ासूर, आदि कृष्णकाल मे असुर थे और कंस के सेवक थे. इसी तरह भीम ने भी कई असुरो का वध किया था जो अधिकतर नरभक्षी थे और घने जंगलों मे निवास करते थे. ईरान को असुरो का राज्य माना जाता है. परसियों के देवता अहुर्मज़ड को मेधाई असुर कहा जाता है. धीरे धीरे असुर देवों के विरोधी हो गए राज्य और सीमा विस्तार को लेकर. ईरान मे शाशन से पूर्व असुरों नर भारत मे राज्य किया. फिर सुरों ने देवो ने इन्हे यहां से भगाया. कालयवन भी अरब ईरान क्षेत्र का ही बादशाह था. देत्यो असुरो के गुरु शुक्राचार्य थे जबकि देवताओं या सुरों के गुरु बृहस्पति थे.

असुर शब्द का प्रयोग ऋग्वेद मे भी हुआ है. वेदों मे असुरों को ही दैत्य कहा गया है. दानव और राक्षस अलग थे जैसा क़ी ऊपर वर्णित है ही.

Asura
This article is about Asura in Hindu mythology. For other uses, see Asura (disambiguation).



The bas-relief of Samudra manthan from Angkor Wat, Cambodia, shows Vishnu in the center, in his Kurma avatar, with the asuras and the devas on either side. See an annotated version in the Wikimedia Commons. Asuras (Sanskrit: असुर) are a class of divine beings or power-seeking deities related to the more benevolent Devas (also known as Suras) in Hindu mythology.

Asuras are sometimes considered nature spirits. They battle constantly with the devas. Asuras are described in Indian texts as powerful superhuman demigods with good or bad qualities. The good Asuras are called Adityas and are led by Varuna, while the malevolent ones are called Danavas and are led by Vritra.In the earliest layer of Vedic texts Agni, Indra and other gods are also called Asuras, in the sense of them being "lords" of their respective domains, knowledge and abilities. In later Vedic and post-Vedic texts, the benevolent gods are called Devas, while malevolent Asuras compete against these Devas and are considered "enemy of the gods".

Asuras are part of Indian mythology along with Devas, Yakshas (nature spirits) and Rakshasas (ghosts, ogres). Asuras feature in one of many cosmological theories in Hinduism
Etymology and history Monier-Williams traces the etymological roots of Asura (असुर) to Asu (असु), which means life of the spiritual world or departed spirits. In the oldest verses of the Samhita layer of Vedic texts, the Asuras are any spiritual, divine beings including those with good or bad intentions, and constructive or destructive inclinations or nature. In later verses of the Samhita layer of Vedic texts, Monier Williams states the Asuras are "evil spirits, demons and opponents of the gods". Asuras connote the chaos-creating evil, in Hindu and Persian (collectively, Aryan) mythology about the battle between good and evil.

Bhargava states the word, Asura, including its variants, asurya and asura, occurs "88 times in the Rigveda, 71 times in the singular number, four times in the dual, 10 times in the plural, and three times as the first member of a compound. In this, the feminine form, asuryaa, is included twice. The word, asurya, has been used 19 times as an abstract noun, while the abstract form asuratva occurs 24 times, 22 times in each of the 22 times of one hymn and twice in the other two hymns".

Asura is used as an adjective meaning "powerful" or "mighty". In the Rigveda, two generous kings, as well as some priests, have been described as asuras. One hymn requests a son who is an asura. In nine hymns, Indra is described as asura. Five times, he is said to possess asurya, and once he is said to possess asuratva. Agni has total of 12 asura descriptions, Varuna has 10, Mitra has eight, and Rudra has six. Bhargava gives a count of the word usage for every Vedic deity. The Book 1 of Rig Veda describes Savitr (Vedic solar deity) as an Asura who is a "kind leader".


हिरण्यहस्तो असुरः सुनीथः सुमृळीकः स्ववाँ यात्वर्वाङ् ।
अपसेधन्रक्षसो यातुधानानस्थाद्देवः प्रतिदोषं गृणानः ॥१०॥

May he, gold-handed Asura, kind leader, come hither to us with his help and favour.
Driving off Raksasas and Yatudhanas, [he] the god is present, praised in hymns at evening.
– Translated by Ralph Griffith

May the golden-handed, life-bestowing, well-guiding, exhilarating and affluent Savitri [Asura] be present;
for the deity, if worshipped in the evening, is at hand, driving away Rakshasas and Yatudhanas.
– Translated by HH Wilson
— Rigveda 1.35.10 In later texts, such as the Puranas and the Itihasas with the embedded Bhagavad Gita, the Devas represent the good, and the Asuras the bad. According to the Bhagavad Gita (16.6-16.7), all beings in the universe have both the divine qualities (daivi sampad) and the demonic qualities (asuri sampad) within each. The sixteenth chapter of the Bhagavad Gita states that pure god-like saints are rare and pure demon-like evil are rare among human beings, and the bulk of humanity is multi-charactered with a few or many faults.According to Jeaneane Fowler, the Gita states that desires, aversions, greed, needs, emotions in various forms "are facets of ordinary lives", and it is only when they turn to lust, hate, cravings, arrogance, conceit, anger, harshness, hypocrisy, cruelty and such negativity- and destruction-inclined that natural human inclinations metamorphose into something demonic (Asura).

Asko Parpola traces the etymological root of Asura to *asera- of Uralic languages, where it means "lord, prince".

Discussion Scholars have disagreed on the nature and evolution of the Asura concept in ancient Indian literature. The most widely studied scholarly views on Asura concept are those of FBJ Kuiper, W Norman Brown, Haug, von Bradke, Otto, Benveniste, Konow, Rajwade, Dandekar, Darmesteter, Bhandarkar and Raja, Banerji-Sastri, Padmanabhayya, Skoeld, SC Roy, kumaraswamy, Shamasastry, Przyluski, Schroeder, Burrows, Hillebrandt, Taraporewala, Lommel, Fausboll, Segerstedt, Thieme, Gerschevitch, Boyce, Macdonnell, Hermann Oldenberg, Geldner, Venkatesvaran, and Jan Gonda.

Kuiper calls Asuras a special group of gods in one of major Vedic theories of creation of the universe.Their role changes only during and after the earth, sky and living beings have been created. The sky world becomes that of Devas, the underworld becomes that of Asuras. Deity Indra is the protagonist of the good and the Devas, while dragon Vrtra who is also one of asuras is the protagonist of the evil. During this battle between good and evil, creation and destruction, some powerful Asuras side with the good and are called Devas, other powerful Asuras side with the evil and thereafter called Asuras. This is the first major dualism to emerge in the nature of everything in the Universe. Hale, in his review, states that Kuiper theory on Asura is plausible but weak because the Vedas never call Vrtra (the central character) an Asura as the texts describe many other powerful beings. Secondly, Rigveda never classifies Asura as "group of gods" states Hale, and this is a presumption of Kuiper.

Many scholars describe Asuras to be "lords" with different specialized knowledge, magical powers and special abilities, which only later choose to deploy these for good, constructive reasons or for evil, destructive reasons. The former become known as Asura in the sense of Devas, the later as Asura in the sense of demons. Kuiper, Brown, Otto and others are in this school; however, none of them provide an explanation and how, when and why Asura came ultimately to mean demon. Asuras are non-believers of god and believed in their own powers.

Ananda Coomaraswamy suggested that Devas and Asuras can be best understood as Angels-Theoi-Gods and Titans of Greek mythology, both are powerful but have different orientations and inclinations, the Devas representing the powers of Light and the Asuras representing the powers of Darkness in Hindu mythology. According to Coomaraswamy, "the Titan [Asura] is potentially an Angel [Deva], the Angel still by nature a Titan" in Hinduism.

Indo-Iranian context In the 19th century, Haug pioneered the idea that the term Asura is linguistically related to the Ahuras of Indo-Iranian people and pre-Zoroastrianism era. In both religions, Ahura of pre-Zoroastrianism (Asura of Hinduism), Vouruna (Varuna) and Daeva (Deva) are found, but their roles are on opposite sides That is, Ahura evolves to represent the good in pre-Zoroastrianism, while Asura evolves to represent the bad in Vedic religion, while Daeva evolves to represent the bad in pre-Zoroastrianism, while Deva evolves to represent the good in Vedic religion. This contrasting roles have led some scholars to deduce that there may have been wars in proto-Indo-European communities, and their gods and demons evolved to reflect their differences. This idea was thoroughly researched and reviewed by Peter von Bradke in 1885.

The relationship between ahuras/asuras and daevas/devas in Indo-Iranian times, was discussed at length by F.B.J. Kuiper. This theory and other Avesta/Assyrian-driven hypotheses developed over the 20th century, are all now questioned particularly for lack of archaeological evidence. Asko Parpola has re-opened this debate by presenting archaeological and linguistic evidence, but notes that the links may go earlier to Uralic languages roots.

Relation to Germanic deities
Main article: Æsir Some scholars such as Asko Parpola suggest that the word Asura may be related to proto-Uralic and proto-Germanic history. The Aesir-Asura correspondence is the relation between Vedic Sanskrit Asura and Old Norse Æsir and Proto-Uralic *asera, all of which mean 'lord, powerful spirit, god'. Parpola states that the correspondence extends beyond Asera-Asura, and extends to a host of parallels such as Inmar-Indra, Sampas-Stambha and many other elements of respective mythologies.

Characteristics of Asuras


The concept of Asura-Devas migrated from India to southeast Asia in 1st millennium CE. Above Vayuphak Asura, from the Hindu epic Ramayana, represented in Thailand. In the earliest Vedic literature, all supernatural beings are called Devas and Asuras.. A much studied hymn of the Rigveda states Devav asura (Asuras who have become Devas), and contrasts it with Asura adevah (Asuras who are not Devas). Each Asura and Deva emerges from the same father (Prajapati), share the same residence (Loka), eat together the same food and drinks (Soma), and have innate potential, knowledge and special powers in Hindu mythology; the only thing that distinguishes "Asura who become Deva" from "Asura who remain Asura" is intent, action and choices they make in their mythic lives.

"Asuras who remain Asura" share the character of powerful beings obsessed with their craving for ill-gotten Soma and wealth, ego, anger, unprincipled nature, force and violence Further, when they lose, miss or don't get what they want because they were distracted by their cravings, the "Asuras who remain Asuras" question, challenge and attack the ""Asuras who become Devas" to loot and get a share from what Devas have and they don't, in Hindu mythology. The hostility between the two is the source of extensive legends, tales and literature in Hinduism; however, many texts discuss their hostility in neutral terms and without explicit moral connotations or condemnation Some of these tales are the basis behind major Hindu Epics and annual festivals, such as the story of Asura Ravana and Deva Rama in the Ramayana and the legend of Asura Hiranyakashipu and Deva Vishnu as Narasimha, the latter celebrated with the Hindu spring festival of Holika and Holi.

Symbolism Edelmann and other scholars state that the dualistic concept of Asura and Deva in Hinduism is a form of symbolism found throughout its ancient and medieval literature. In the Upanishads, for example, Devas and Asuras go to Prajāpati to understand what is Self (Atman, soul) and how to realize it. The first answer that Prajāpati gives is simplistic, which the Asuras accept and leave with, but the Devas led by Indra do not accept and question because Indra finds that he hasn't grasped its full significance and the given answer has inconsistencies. Edelmann states that this symbolism embedded in the Upanishads is a reminder that one must struggle with presented ideas, learning is a process, and Deva nature emerges with effort. Similar dichotomies are present in the Puranas literature of Hinduism, where god Indra (a Deva) and the antigod Virocana (an Asura) question a sage for insights into the knowledge of the self. Virocana leaves with the first given answer, believing now he can use the knowledge as a weapon. In contrast, Indra keeps pressing the sage, churning the ideas, and learning about means to inner happiness and power. Edelmann suggests that the Deva-Asura dichotomies in Hindu mythology may be seen as "narrative depictions of tendencies within our selves".

The god (Deva) and antigod (Asura), states Edelmann, are also symbolically the contradictory forces that motivate each individual and people, and thus Deva-Asura dichotomy is a spiritual concept rather than mere genealogical category or species of being. In the Bhāgavata Purana, saints and gods are born in families of Asuras, such as Mahabali and Prahlada, conveying the symbolism that motivations, beliefs and actions rather than one's birth and family circumstances define whether one is Deva-like or Asura-like.

Asuri Asuri is the feminine of an adjective from asura and in later texts means belonging to or having to do with demons and spirits. Asuri parallels Asura in being "powerful beings", and in early Vedic texts includes all goddesses. The term Asuri also means a Rakshasi in Indian texts.

The powers of an Asuri are projected into plants offering a remedy against leprosy

First, before all, the strong-winged Bird was born, thou wast the gall thereof.
Conquered in fight, the Asuri took then the shape and form of plants.
The Asuri made, first of all, this medicine for leprosy, this banisher of leprosy.
She banished leprosy, and gave one general colour to the skin.

— A charm against leprosy, Atharva Veda, Hymn 1.24, In Book 7, Asuri is a powerful female with the special knowledge of herbs, who uses that knowledge to seduce Deva Indra in Atharva Veda. A hymn invokes this special power in Asuri, and this hymn is stipulated for a woman as a charm to win over the lover she wants.

I dig this Healing Herb that makes my lover look on me and weep,
That bids the parting friend return and kindly greets him as he comes.
This Herb wherewith the Asuri drew Indra downward from the Gods,
With this same Herb I draw thee close that I may be most dear to thee.

Thou art the peer of Soma, yea, thou art the equal of the Sun,
The peer of all the Gods art thou: therefore we call thee hitherward.
I am the speaker here, not thou: speak thou where the assembly meets.
Thou shalt be mine and only mine, and never mention other dames.

If thou art far away beyond the rivers, far away from men,
This Herb shall seem to bind thee fast and bring thee back my prisoner.

— A maiden's love-charm, Atharva Veda, Hymn 7.38, Similarly, in the Atharva Veda, all sorts of medical remedies and charms are projected as Asuri manifested in plants and animals. Asuri Kalpa is an abhichara (craft) which contains various rites derived from special knowledge and magic of Asuri.

Agni, Vedic god associated with fire, is 12 times glorified as 'asura' in Rigveda (image from around 1830)

Varuna, Vedic god associated with water, is 10 times glorified as 'asura' in Rigveda (image from between 1675 and 1700)


Rudra, Vedic god (related to Shiva), is 6 times glorified as 'asura' in Rigveda (image from the 19th century)



Indra, Vedic god, leader of the Devas on heavenly planets, in nine Vedic hymns is glorified as 'asura' (image from around 1820)

Hindu mythology

Vishnu Purana According to the Vishnu Purana, during the Samudra manthan or "churning of the ocean", the daityas came to be known as asuras because they rejected Varuni, the goddess of sura "wine", while the devas accepted her and came to be known as suras.

Shiva Purana
Alain Daniélou states that Asuras were initially good, virtuous and powerful in Indian mythology. However, their nature gradually changed and they came to represent evil, vice and abuse of power. In Shiva Purana, they evolved into anti-gods and had to be destroyed because they threatened the gods.

The asuras (anti-gods) were depicted to have become proud, vain, to have stopped performing sacrifices, to violate sacred laws, not visit holy places, not cleanse themselves from sin, to be envious of devas, torturous of living beings, creating confusion in everything and challenging the devas.

Alain Daniélou states that the concept of asuras evolved with changing socio-political dynamics in ancient India. Asuras gradually assimilated the demons, spirits, and ghosts worshipped by the enemies of Vedic people, and this created the myths of the malevolent asuras and the rakshasa. The allusions to the disastrous wars between the asuras and the suras, found in the Puranas and the epics, may be the conflict faced by people and migrants into ancient India.


Buddhism
Main article: Asura (Buddhism) Asuras (Tib: lha ma yin, Chi: Axiuluo, Jap: Ashura) are a type of supernatural being (anti-gods, demigods or non-god titans) in traditional Buddhist cosmology and a realm of rebirth based on one's karma in current or past lives. They are described in Buddhist texts as creatures who live in lower levels of mount Sumeru, obsessed with sensuous aspects of existence, living with jealousy and endlessly engaged in wars against the creatures who are Devas (gods). As Buddhism spread into East Asia, the Asura concept of Indian Buddhism expanded and integrated local pre-existing deities as a part of regional Buddhist pantheon



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