खटीक समाज

 


खटिक

खटीक समाज :: खटीक जाति का इतिहास
खटीक... वो बहादुर जिनसे मुगलों की रुह कांपती थी
By
National Times Desk

कौन हैं खटीक?

खटीक भारत का एक मूल समुदाय यानि जाति है जो वर्तमान में अनुसूचित जाति के अंतर्गत वर्गीकृत की गई है। जिनकी संख्या लगभग 1.7 मिलियन है। भारत में यह उत्तर प्रदेश, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, चंडीगढ़, पश्चिम बंगाल, बिहार और गुजरात में बसे हुए हैं। तथा व्यापक रूप से उत्तर भारत में बसा हुआ है।

प्रत्येक खटीक उपजाति का अपना मूल मिथक है, वे ऐतिहासिक रूप से क्षत्रिय थे जिन्हें राजाओं द्वारा यज्ञ में पशुओं की बलि करने का कार्य सौंपा गया था। आज भी हिंदू मंदिरों में बलि के दौरान जानवरों को वध करने का अधिकार केवल खटीकों को ही है।

खटीक समाज की एक परंपरा के अनुसार खटिक शब्द का उद्गम हिंदी शब्द खट्ट से लिया गया है, जिसका मतलब है कि तत्काल हत्या। वे इसे शुरुआती दिनों से संबंधित करते हैं जब वे राजस्थान के राजाओं को मटन की आपूर्ति करते थे।

पंजाब में खटीक नमक और मदार (कैलोट्रिपोस जाइगैन्टिया) के रस का इस्तेमाल बकरी और भेड़ की खाल रंगने के लिए किया करते थे।

खटीकों के दो प्रमुख उपसमूह हैं सूर खटीक और खलरंगे खटीक। सूर खटीकों (सोनकर) की मान्यतानुसार उनकी उत्पत्ति की परम्परा अलग है।

सूर खटीकों के मुताबिक, मुगल सम्राट औरंगजेब के शासन के दौरान, खटीक समुदाय के सदस्यों को इस्लाम में परिवर्तित किया जा रहा था।

आगे रूपांतरण को रोकने के लिए, समुदाय ने सूअरों को पालने का फैसला किया।

हिंदू खटीक भैरों और सिद्ध मसानी की पूजा करते है वे दुर्गा के रूप में आस्था रखते हैं उत्तर प्रदेश में चामड़ को पूजा जाता है जो दुर्गा का ही एक रूप है।

17 वीं शताब्दी में, जिनक कुलों को इस्लाम में बदल दिया गया था। पंजाब के मुस्लिम खातेक में दो कुलों, राजपूत और घोरी पठान हैं। 1 9 47 में आजादी के बाद से, मुस्लिम खातेक पाकिस्तान में चले गए और उन्होंने तनियों की स्थापना की, और अब उन्हें शेख कहा जाता है।

मूल

Khatik शब्द संस्कृत khatika से व्युत्पन्न है एक कस्तूरा या शिकारी अर्थ है। एक और व्युत्पत्ति शब्द खत से है जिसका अर्थ है कि तत्काल हत्या। अपने समुदाय के मूल के बारे में कई संस्करण हैं गुजरात और राजस्थान में, जहां उन्हें खटकी भी कहा जाता है, वे राजपूत या क्षत्रिय से वंश का दावा करते हैं, जो शासक के दूसरे सबसे उच्च योद्धा वर्ग हैं। उनका मानना है कि वे मूल रूप से योद्धा थे और किसी तरह कुछ आबादी के कारण अपने वर्तमान व्यवसाय को अपनाया। राजस्थान में, खतिक का दावा है कि क्योंकि योद्धा संत परशुराम (विष्णु का 6 वां अवतार) राजपूत से नाराज था, उन्होंने उनके द्वारा अपनी हत्या को छोड़कर अपनी पहचान बदल ली और खटिक के पूर्वजों बन गए

Khatik पड़ोसी उत्तर प्रदेश और राजस्थान से लगभग 200 साल पहले दिल्ली में चले गए। वहां उनका दावा है, वे मूल रूप से कृषक थे और कट्टर 17 वीं शताब्दी के शासनकाल के दौरान मुगल बादशाह औरंगजेब उनमें से कुछ इस्लाम में परिवर्तित हुए थे। हरियाणा में खटिक का दावा है कि उन्होंने राजस्थान के शासकों को मांस की आपूर्ति की और वहां से अन्य स्थानों पर चले गए।

चंडीगढ़ और हरियाणा में खटिक का मानना है कि ब्रह्मा (हिंदू त्रिमूर्ति में प्रजापति) ने उन्हें एक बकरी की त्वचा, वृक्षों और लाखों की छाल दी थी और इसलिए वे पशु, तन और डाई बकरी और छाल और लाख के साथ हिरण छिपाए (गुलाब) , 1 9 1 9)

राजनैतिक दर्जा

16 वीं लोकसभा चुनाव के आधार पर खतिक समुदाय से भारत में संसद के 7 सदस्य , उनके नाम हैं: मनोज राजोरिया, विनोद कुमार सोनकर, डॉ उदित राज, वीरेंद्र कुमार, नीलम सोनकर और भोला सिंह।

बोली जाने वाली भाषा


खतिक उन क्षेत्रों की भाषाओं की बात करते हैं जो वे रहते हैं। गुजरात में, वे गुजराती बोलते हैं, गुजराती लिपि का इस्तेमाल करते हैं, जबकि आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में, मराठी उनकी पहली भाषा है। वे उत्तर प्रदेश में हिंदी बोलते हैं, राजस्थान में स्थानीय राजस्थानी बोलियों; हरियाणा में हरियाणा और बिहार में भोजपुरी। इन सभी भाषाओं देवनागरी लिपि में लिखी गई हैं। Khatik भी हिंदी के साथ परिचित हैं मुस्लिम खटिक उर्दू बोलते हैं और इसे लिखने के लिए फारसी-अरबी स्क्रिप्ट का इस्तेमाल करते हैं।

खटिक खुद चमार (टान्नर), बाल्मीकी (मेहंदी), लोहर (आयरनशिप) और कंजर (जिप्सी) से बेहतर हैं, लेकिन बानिया (व्यापारी), ब्राह्मण (पुजारी), राजपूत (योद्धा) और जाट के ऊपर से नीची हैं। उच्च हिंदू जाति, हालांकि, खतिक को शूद्र वर्ग से संबंधित माना जाता है, चौथी और सबसे नीची जाति।

जीवन स्तर

मुख्य में खटिक का पारंपरिक और वर्तमान कब्जा कत्तल और भेड़ों, बकरियों और सूअरों की बिक्री जारी है। हरियाणा और पंजाब जैसे कुछ राज्यों में, जहां वे मुख्य रूप से मुस्लिम हैं, उनका मुख्य व्यवसाय बकरी और भेड़ छिपकर रंग ला रहा है, जबकि राजस्थान जैसे अन्य राज्यों में वे भी पशु खरीदते हैं और उन्हें एक सहायक उद्यम के रूप में बाजार में बेचते हैं। पंजाब और दिल्ली में हिंदू खटिक उठते हैं और सूअरों को मारते हैं। अन्य राज्यों में वे मध्यम आदमी हैं – सब्जियों, फलों, सूअरों और मुर्गी में पारंपरिक व्यापारी।

भूमिहीन खतिक खेत का एक हिस्सा शेयरधारक आधार पर है। कुछ अपनी साइकिल या बैक-पेक्स, कांच के चूड़ियां, प्लास्टिक के सामान या स्क्रैप-डीलरों से कपड़ा बेचते हैं। कुछ ऐसे हैं जो छोटे होटल चलाते हैं वे रोज़गार मजदूरों के रूप में भी काम करते हैं – सड़क निर्माण और निर्माण स्थलों में। बच्चों को चाय के स्टालों या ऑटोमोबाइल कार्यशालाओं में काम करने के लिए भेजा जाता है उनके बीच कुछ शिक्षकों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, पुलिस निरीक्षक, क्षेत्रीय विकास अधिकारी और प्रशासक हैं। राजनीतिक चेतना स्थानीय और क्षेत्रीय स्तरों पर देखा जाता है।

खतिक में साक्षरता स्तर कम है। अधिकांश परिवार अपने बेटों को तृतीयक स्तर पर अध्ययन करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं लेकिन बेटियां नहीं हैं।

हालांकि वे आधुनिक चिकित्सा स्वीकार करते हैं और परिवार कल्याण कार्यक्रम खटिक के बीच स्वीकार किए जाते हैं, हालांकि वे परंपरागत दवाओं का उपयोग जारी रखते हैं। वे सरकार द्वारा पेश किए गए विभिन्न रोजगार-सृजन और अन्य विकास कार्यक्रमों का लाभ उठाते हैं। वे राष्ट्रीयकृत बैंकों को बचत और सुरक्षित ऋण के लिए उपयोग करते हैं, लेकिन स्थानीय सावकारियों और दुकानदारों पर भी ऋण के लिए निर्भर करते हैं।

बिहार और गुजरात राज्यों में रहने वालों के अलावा, इस समुदाय को अनुसूचित जाति (एससी) के रूप में माना जाता है। यह स्थिति उन्हें (साथ ही अन्य इसी तरह वर्गीकृत जातियों) विशेषाधिकारों और लाभों की एक विशेष अनुदान देती है, जैसे कि सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा संस्थानों में विशेष रूप से तय कोटा, प्रतियोगी परीक्षाओं में कम बेंचमार्क, साथ ही संसद और राज्य विधानसभा में आरक्षित सीटें ।

अन्य बातें

Khatik endogamous हैं, या तो वे केवल समुदाय के भीतर से शादी। कभी-कभी वे उपसमूह स्तर पर भी अंतःप्रेर भी होते हैं, लेकिन कबीले के स्तर पर हमेशा एकमात्र होते हैं। वह उत्तर प्रदेश में उप समूह व्यावसायिक, सामाजिक और क्षेत्रीय भेदभाव पर आधारित हैं।

पारिवारिक सदस्यों के बीच बातचीत द्वारा वयस्क विवाह का आयोजन किया जाता है। दहेज नकद और दयालु में भुगतान किया जाता है दुर्लभ मामलों में बहुविवाह की अनुमति है जैसे कि पहली पत्नी की बर्बरता। महिलाओं के लिए विवाह प्रतीकों कांच, प्लास्टिक और लाख चूड़ियाँ, सिंदूर (सिंधुर), माथे (बिंदी), उंगली, कान, नाक और पैर की अंगुली के छल्ले पर डॉट्स हैं।

जूनियर सैरेट और जूनियर लेविरेट की अनुमति है। तलाक, हालांकि संभव है, सामाजिक रूप से निराश है और बहुत दुर्लभ है। आंध्र प्रदेश के अलावा विधवा, विधुर और तलाकशुदा पुनर्विवाह की अनुमति है, जहां तलाक और विधवा पुनर्विवाह पूरी तरह से निषिद्ध है।

संयुक्त परिवार खतिक में आम है लेकिन वे अलग-अलग रह रहे हैं। विरासत पैतृक है; बेटे माता-पिता की संपत्ति को समान रूप से वारिस करते हैं और सबसे पुराना पिता के अधिकार के प्रति सफल होता है। बेटियों को कोई विरासत नहीं मिला यद्यपि खतिक महिलाओं की स्थिति कम है, उनके पास धार्मिक, धार्मिक, धार्मिक और राजनीतिक गतिविधियों में भी भूमिका है। वे कृषि श्रमिकों, घरेलू नौकरों के रूप में काम करके, कपड़े बनाने, स्वेटर बुनाई, पेपर बैग और लिफ़ाफ़े बनाने, फलों और सब्जियों को बेचने के द्वारा परिवार की आय में योगदान करते हैं। वे कभी-कभी जानवरों के पालन करने और कत्तल पशुओं की सफाई में अपने लोगों की मदद करते हैं।

खतिक में क्षेत्रीय लोक संगीत, लोककथाओं और लोगों का अस्तित्व होता है। फ़ोल्क्सोंग्स ज्यादातर महिलाओं द्वारा गाए जाते हैं और त्यौहारों और जन्म और विवाह जैसे अन्य शुभ अवसरों के दौरान केवल महिला नृत्य करते हैं। दीवार चित्रों, देवी दुर्गा और कढ़ाई की छवियां बनाने में उनकी कुछ कलाएं और शिल्प हैं

खटिक के पास प्रत्येक राज्य में अपनी जाति परिषद है, दोनों गांवों और क्षेत्रीय स्तर पर बुजुर्ग लोगों द्वारा प्रतिनिधित्व किया गया है। गुजरात में क्षेत्रीय परिषद को बारारा पंच के रूप में जाना जाता है। राजस्थान में गांव के स्तर पर एक जाति पंचायत (जाति परिषद) है जो शादी, तलाक, सामुदायिक मानदंडों का उल्लंघन और नकदी जुर्माना से संबंधित सामाजिक प्रकृति के विवाद को सुलझाने में जुटी है। परिषद को भी बहिष्कृत करने की शक्ति है.

विश्वास व् मान्यताएं

अधिकांश खतिक हिंदू हैं और सभी प्रमुख हिंदू देवताओं और देवी की पूजा करते हैं। कई खतिक के पास अपने क्षेत्र के विभिन्न क्षेत्रीय देवताओं के लिए बहुत सम्मान है और बुरी आत्माओं में विश्वास करते हैं। पूर्वजों की पूजा उनके विश्वास प्रणाली का एक अतिरिक्त हिस्सा है

खतिक सभी प्रमुख हिंदू त्योहारों जैसे जन्माष्टमी (कृष्णा के जन्मदिन), नवरात्री (9 रातों का त्योहार), दिवाली (दीपक का त्योहार) और होली का जश्न मनाते हैं। हिंदू खटिक के मृतकों का अंतिम संस्कार और एक नदी में राख को विसर्जित करना, अधिमानतः हरिद्वार में पवित्र गंगा आंध्र प्रदेश और मुस्लिम खटिक ने मरे हुओं को दफन दिया

सिख खतिक गुरु नानक के जन्मदिन, लोहड़ी (फसल त्योहार), और गुरुद्वारों की यात्रा जैसे त्योहार मनाते हैं, जबकि मुस्लिम खतिक मस्जिदों की यात्रा करते हैं और ईद और मुहर्रम जैसे मुस्लिम त्योहार मनाते हैं।

उनकी क्या जरूरत है?

खतिक को शिक्षा तक पहुंच की जरूरत है, खासकर लड़कियों के लिए खटीक जाति भारत और पाकिस्तान में पाई जाती है तथा दक्षिण एशिया में पाई जाने वाली यह सबसे वृहद जातियों में से एक है।

खटीक शब्द “आखेटक” का ही अपभ्रंश है जिसका अर्थ होता है शिकारी या शिकार करने वाला।

पशुओं की बलि करते समय खट्ट से एक ही वार में सिर को धड़ से अलग कर देने के कारण ही खटीक नाम पड़ा ऐसा माना जाता है।

इतिहास से मिले साक्ष्यों के अनुसार खटीक जाति का मुख्य व्यवसाय पशुओं की बलि देना होता था, खटीक जाति एक वीर जाति होती है जो जंगली जानवरों का शिकार करके तथा पालतू भेड़ बकरियों के मांस द्वारा राजाओं की सेना के लिए मीट की आपूर्ति व भोजन का प्रबंध किया करते थे।

कबीर दास जी द्वारा खटीक शब्द का उल्लेख संत कबीर जी ने इस तथ्य को बड़ी ही सुंदरता के साथ अपनी कबीर सागर में प्रस्तुत किया है:-

आठ बाट बकरी गई, मांस मुल्ला गए खाय।
आजहू खाल खटीक घर, भिस्त कहाँ ते जाय।


कबीर गाफिल क्या करे, आया काल नजीक ।
कान पकरि के ले चला, ज्यों अजियाहि खटीक ॥


अर्थात जब म्रत्यु नजदीक आती है तो कोई कुछ नहीं कर सकता जैसे बकरे की मृत्यु आने पर खटीक उसको कान पकड़कर खींचकर ले जाता है।


कबीर हरि सो हेत कर, कोरै चित ना लाये
बंधियो बारि खटीक के, ता पशु केतिक आये।


कबीर कहते है की प्रभु से प्रेम करो।
अपने चित्त में कूड़ा कचरा मत भरों।


एक पशु कसाई के द्वार पर बांध दिया गया है-समझो उसकी आयु कितनी शेष बची है।

आज भी देशभर में खटीक जाति के लोग मीट का व्यवसाय करके अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। इनकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति को देखते हुए भारत देश के कुछ राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश व दिल्ली में हिन्दू खटीक समाज को अनुसूचित जाति का दर्जा मिला हुआ है।

खटीक भेड़ – बकरियों व घोड़ों को पालते थे, जिनके समूह को “सूर्यवँशी खटीक” के नाम सम्बोधित किया जाता है। ये घोड़ागाड़ी (ताँगा) चलाकर अपनी गुजर बसर किया करते थे।

इसके अलावा ऐसा माना जाता है कि मुस्लिम आक्रांताओं से अपने परिवार की बहू बेटियों की इज्जत बचाने के लिए बहुत से खटीकों ने सूकर पालन शुरू कर दिया ताकि मुस्लिम आक्रांताओं को अपने घर से दूर रखा जा सके। इन खटीकों को बाद में “ख़ल्लु खटीक” नाम से जाना जाने लगा।

वर्तमान समय में इनको सोनकर नाम से जाना जाता है। सूर्यवँशी और सोनकर आपस में शादी ब्याह करने से परहेज करते हैं उम्मीद है कि शिक्षा के जरिये दोनों वर्ग अपनी रूढ़िवादी सोच को बदलेंगे व फिर से आपस में शादी ब्याह करने लगेंगे।

पूर्व में खटीक जाति के साथ छुआछात की जाती रही है जिसके कारण खटीक समाज अपेक्षाकृत प्रगति नहीं कर सका और आर्थिक रूप से कमजोर रहा।

लेकिन जैसे जैसे समाज शिक्षा प्राप्त कर रहा है वैसे वैसे समाज की आर्थिक स्थिति सुधरती जा रही है, आज के समय में खटीक जाति के लोग हर क्षेत्र में बेहतर कार्य कर रहे हैं व ऊंचे पदों पर कार्यरत हैं।

16वीं लोकसभा चुनावों (2014) के आधार पर भारत में खटीक समाज के 7 सांसद हैं। जिनके नाम मनोज राजौरिया, विनोद सोनकर, डॉक्टर उदित राज, वीरेंद्र कुमार खटीक, नीलम सोनकर, डॉक्टर भोला सिंह हैं।

कुछ विद्वानों द्वारा सूर्यवँशी खटीक समाज के 360 प्रमुख गोत्र निर्धारित किये गए हैं इनमें चन्देल, पंवार, चौहान, बड़गुजर, राजौरा, बुंदेला आदि ऐसे गोत्र हैं जो राजपूतों में भी पाए जाते हैं।

इसलिए कुछ लोगों का मानना है कि खटीक समाज भी राजपूत होते हैं लेकिन अभी तक इसके कोई पुख्ता सबूत नहीं मिल पाने के कारण यह एक बहस का मुद्दा बना हुआ है।

खटीक समाज के कुछ दलित चिंतकों का मानना है अगर खटीक भी राजपूत होते तो राजपूतों द्वारा खटीकों के साथ रोटी बेटी का व्यवहार अवश्य किया जाता। और राजपूतों के समारोहों, आयोजनों में खटीकों को भी आमंत्रित किया जाता।

देश – भारत, पाकिस्तान

मुख्य भाषाएं – हिंदी, पंजाबी, राजस्थानी

धर्म – हिन्दू, जैन, इस्लाम, सिख

सबसे अधिक जनसंख्या – उत्तर प्रदेश, राजस्थान

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http://newsloose.com/2018/07/18/history-of-khateek-caste-bijay-sonkar-shastri/

चमार एवं खटिक जाति का गौरवशाली इतिहास..




सिकन्दर लोदी (१४८९-१५१७) के शासनकाल से पहले पूरे भारतीय इतिहास में ‘चमार’ नाम की किसी जाति का उल्लेख नहीं मिलता। आज जिन्हें हम ‘चमार’ जाति से संबोधित करते हैं और जिनके साथ छूआछूत का व्यवहार करते हैं, दरअसल वह वीर चंवरवंश के क्षत्रिय हैं। जिन्हें सिकन्दर लोदी ने चमार घोषित करके अपमानित करने की चेष्टा की।

भारत के सबसे विश्वसनीय इतिहास लेखकों में से एक विद्वान कर्नल टाड को माना जाता है जिन्होनें अपनी पुस्तक ‘द हिस्ट्री आफ राजस्थान’ में चंवरवंश के बारे में विस्तार से लिखा है।

प्रख्यात लेखक डॅा विजय सोनकर शास्त्री ने भी गहन शोध के बाद इनके स्वर्णिम अतीत को विस्तार से बताने वाली पुस्तक “हिन्दू चर्ममारी जाति: एक स्वर्णिम गौरवशाली राजवंशीय इतिहास” लिखी। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी इस राजवंश का उल्लेख है।

डॉ शास्त्री के अनुसार प्राचीनकाल में न तो चमार कोई शब्द था और न ही इस नाम की कोई जाति ही थी।

‘अर्वनाइजेशन’ की लेखिका डॉ हमीदा खातून लिखती हैं,

मध्यकालीन इस्लामी शासन से पूर्व भारत में चर्म एवं सफाई कर्म के लिए किसी विशेष जाति का एक भी उल्लेख नहीं मिलता है। हिंदू चमड़े को निषिद्ध व हेय समझते थे। लेकिन भारत में मुस्लिम शासकों के आने के बाद इसके उत्पादन के भारी प्रयास किए गये थे।

डा विजय सोनकर शास्त्री के अनुसार तुर्क आक्रमणकारियों के काल में चंवर राजवंश का शासन भारत के पश्चिमी भाग में था और इसके प्रतापी राजा चंवरसेन थे। इस क्षत्रिय वंश के राज परिवार का वैवाहिक संबंध बाप्पा रावल वंश के साथ था। राणा सांगा व उनकी पत्नी झाली रानी ने चंवरवंश से संबंध रखने वाले संत रैदासजी को अपना गुरु बनाकर उनको मेवाड़ के राजगुरु की उपाधि दी थी और उनसे चित्तौड़ के किले में रहने की प्रार्थना की थी।

संत रविदास चित्तौड़ किले में कई महीने रहे थे। उनके महान व्यक्तित्व एवं उपदेशों से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें गुरू माना और उनके अनुयायी बने। उसी का परिणाम है आज भी विशेषकर पश्चिम भारत में बड़ी संख्या में रविदासी हैं। राजस्थान में चमार जाति का बर्ताव आज भी लगभग राजपूतों जैसा ही है। औरतें लम्बा घूंघट रखती हैं आदमी ज़्यादातर मूंछे और पगड़ी रखते हैं।

संत रविदास की प्रसिद्धी इतनी बढ़ने लगी कि इस्लामिक शासन घबड़ा गया सिकन्दर लोदी ने मुल्ला सदना फकीर को संत रविदास को मुसलमान बनाने के लिए भेजा वह जानता था की यदि रविदास इस्लाम स्वीकार लेते हैं तो भारत में बहुत बड़ी संख्या में इस्लाम मतावलंबी हो जायेगे लेकिन उसकी सोच धरी की धरी रह गयी स्वयं मुल्ला सदना फकीर शास्त्रार्थ में पराजित हो कोई उत्तर न दे सका और उनकी भक्ति से प्रभावित होकर अपना नाम रामदास रखकर उनका भक्त वैष्णव (हिन्दू) हो गया। दोनों संत मिलकर हिन्दू धर्म के प्रचार में लग गए जिसके फलस्वरूप सिकंदर लोदी आगबबूला हो उठा एवं उसने संत रैदास को कैद कर लिया और इनके अनुयायियों को चमार यानी अछूत चंडाल घोषित कर दिया। उनसे कारावास में खाल खिचवाने, खाल-चमड़ा पीटने, जुती बनाने इत्यादि काम जबरदस्ती कराया गया उन्हें मुसलमान बनाने के लिए बहुत शारीरिक कष्ट दिए। लेकिन उन्होंने कहा —–

”वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान,
फिर मै क्यों छोडू इसे, पढ़ लू झूठ कुरान.
वेद धर्म छोडू नहीं, कोसिस करो हज़ार,
तिल-तिल काटो चाहि, गोदो अंग कटार” (रैदास रामायण)

संत रैदास पर हो रहे अत्याचारों के प्रतिउत्तर में चंवर वंश के क्षत्रियों ने दिल्ली को घेर लिया। इससे भयभीत हो सिकन्दर लोदी को संत रैदास को छोड़ना पड़ा था।

संत रैदास का यह दोहा देखिए:


बादशाह ने वचन उचारा ।
मत प्यारा इसलाम हमारा ।।


खंडन करै उसे रविदासा ।
उसे करौ प्राण कौ नाशा ।।


जब तक राम नाम रट लावे ।
दाना पानी यह नहींपावे ।।


जब इसलाम धर्म स्वीकारे ।
मुख से कलमा आपा उचारै ।।


पढे नमाज जभी चितलाई ।
दाना पानी तब यह पाई ।


समस्या तो यह है कि आपने और हमने संत रविदास के दोहों को ही नहीं पढ़ा, जिसमें उस समय के समाज का चित्रण है जो बादशाह सिकंदर लोदी के अत्याचार, इस्लाम में जबरदस्ती धर्मांतरण और इसका विरोध करने वाले हिंदू ब्राहमणों व क्षत्रियों को निम्न कर्म में धकेलने की ओर संकेत करता है।

चंवरवंश के वीर क्षत्रिय जिन्हें सिकंदर लोदी ने ‘चमार’ बनाया और हमारे-आपके हिंदू पुरखों ने उन्हें अछूत बना कर इस्लामी बर्बरता का हाथ मजबूत किया।

इस समाज ने पददलित और अपमानित होना स्वीकार किया, लेकिन विधर्मी होना स्वीकार नहीं किया आज भी यह समाज हिन्दू धर्म का आधार बनकर खड़ा है।

अब आइये जानते हैं खटिक जाति के बारे में :-

खटिक जाति मूल रूप से वो ब्राहमण जाति है, जिनका काम आदि काल में याज्ञिक पशु बलि देना होता था। आदि काल में यज्ञ में बकरे की बलि दी जाती थी। संस्कृत में इनके लिए शब्द है, ‘खटिटक’।

मध्यकाल में जब क्रूर इस्लामी अक्रांताओं ने हिंदू मंदिरों पर हमला किया तो सबसे पहले खटिक जाति के ब्राहमणों ने ही उनका प्रतिकार किया। राजा व उनकी सेना तो बाद में आती थी। मंदिर परिसर में रहने वाले खटिक ही सर्वप्रथम उनका सामना करते थे। तैमूरलंग को दीपालपुर व अजोधन में खटिक योद्धाओं ने ही रोका था और सिकंदर को भारत में प्रवेश से रोकने वाली सेना में भी सबसे अधिक खटिक जाति के ही योद्धा थे। तैमूर खटिकों के प्रतिरोध से इतना भयाक्रांत हुआ कि उसने सोते हुए हजारों खटिक सैनिकों की हत्या करवा दी और एक लाख सैनिकों के सिर का ढेर लगवाकर उस पर रमजान की तेरहवीं तारीख पर नमाज अदा की। (पढ़िये मेरे पिछले पोस्ट “भारत में इस्लामी आक्रमण एवं धर्मान्तरण का खूनी इतिहास” ४ भागों में)

मध्यकालीन बर्बर दिल्ली सल्तनत में गुलाम, तुर्क, लोदी वंश और मुगल शासनकाल में जब अत्याचारों की मारी हिंदू जाति मौत या इस्लाम का चुनाव कर रही थी तो खटिक जाति ने अपने धर्म की रक्षा और बहू बेटियों को मुगलों की गंदी नजर से बचाने के लिए अपने घर के आसपास सूअर बांधना शुरू किया।

इस्लाम में सूअर को हराम माना गया है। मुगल तो इसे देखना भी हराम समझते थे। और खटिकों ने मुस्लिम शासकों से बचाव के लिए सूअर पालन शुरू कर दिया। उसे उन्होंने हिंदू के देवता विष्णु के वराह (सूअर) अवतार के रूप में लिया। मुस्लिमों की गो हत्या के जवाब में खटिकों ने सूअर का मांस बेचना शुरू कर दिया और धीरे धीरे यह स्थिति आई कि वह अपने ही हिंदू समाज में पददलित होते चले गए। कल के शूरवीर ब्राहण आज अछूत और दलित श्रेणी में हैं।

1857 की लडाई में मेरठ व उसके आसपास अंग्रेजों के पूरे के पूरे परिवारों को मौत के घाट उतारने वालों में खटिक समाज सबसे आगे था। इससे गुस्साए अंग्रेजों ने 1891 में पूरी खटिक जाति को ही वांटेड और अपराधी जाति घोषित कर दिया।

जब आप मेरठ से लेकर कानपुर तक 1857 के विद्रोह की दासतान पढेंगे तो रोंगटे खडे हो जाए्ंगे। जैसे को तैसा पर चलते हुए खटिक जाति ने न केवल अंग्रेज अधिकारियों, बल्कि उनकी पत्नी बच्चों को इस निर्दयता से मारा कि अंग्रेज थर्रा उठे। क्रांति को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने खटिकों के गांव के गांव को सामूहिक रूप से फांसी दे दिया गया और बाद में उन्हें अपराधि जाति घोषित कर समाज के एक कोने में ढकेल दिया।

आजादी से पूर्व जब मोहम्मद अली जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन की घोषणा की थी तो मुस्लिमों ने कोलकाता शहर में हिंदुओं का नरसंहार शुरू किया, लेकिन एक दो दिन में ही पासा पलट गया और खटिक जाति ने मुस्लिमों का इतना भयंकर नरसंहार किया कि बंगाल के मुस्लिम लीग के मंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि हमसे भूल हो गई। बाद में इसी का बदला मुसलमानों ने बंग्लादेश में स्थित नोआखाली में लिया। आज हम आप खटिकों को अछूत मानते हैं, क्योंकि हमें उनका सही इतिहास नहीं बताया गया है, उसे दबा दिया गया है।

आप यह जान लीजिए कि दलित शब्द का सबसे पहले प्रयोग अंग्रेजों ने 1931 की जनगणना में ‘डिप्रेस्ड क्लास’ के रूप में किया था। उसे ही बाबा साहब अंबेडकर ने अछूत के स्थान पर दलित शब्द में तब्दील कर दिया। इससे पूर्व पूरे भारतीय इतिहास व साहित्य में ‘दलित’ शब्द का उल्लेख कहीं नहीं मिलता है।

हमने और आपने मुस्लिमों के डर से अपना धर्म नहीं छोड़ने वाले, हिंसा और सूअर पालन के जरिए इस्लामी आक्रांताओं का कठोर प्रतिकार करने वाले एक शूरवीर ब्राहमण खटिक जाति को आज दलित वर्ग में रखकर अछूत की तरह व्यवहार किया है और आज भी कर रहे हैं।

भारत में 1000 ईस्वी में केवल 1 फीसदी अछूत जाति थी, लेकिन मुगल वंश की समाप्ति होते-होते इनकी संख्या 14 फीसदी हो गई। आखिर कैसे..?

सबसे अधिक इन अनुसूचित जातियों के लोग आज के उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य भारत में है, जहां मुगलों के शासन का सीधा हस्तक्षेप था और जहां सबसे अधिक धर्मांतरण हुआ। आज सबसे अधिक मुस्लिम आबादी भी इन्हीं प्रदेशों में है, जो धर्मांतरित हो गये थे।

डॉ सुब्रहमनियन स्वामी लिखते हैं, ” अनुसूचित जाति उन्हीं बहादुर ब्राह्मण व क्षत्रियों के वंशज है, जिन्होंने जाति से बाहर होना स्वीकार किया, लेकिन मुगलों के जबरन धर्म परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया। आज के हिंदू समाज को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए, उन्हें कोटिश: प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उन लोगों ने हिंदू के भगवा ध्वज को कभी झुकने नहीं दिया, भले ही स्वयं अपमान व दमन झेला।”

प्रोफेसर शेरिंग ने भी अपनी पुस्तक ‘ हिंदू कास्ट एंड टाईव्स’ में स्पष्ट रूप से लिखा है कि ” भारत के निम्न जाति के लोग कोई और नहीं, बल्कि ब्राहमण और क्षत्रिय ही हैं।”

स्टेनले राइस ने अपनी पुस्तक “हिन्दू कस्टम्स एण्ड देयर ओरिजिन्स” में यह भी लिखा है कि अछूत मानी जाने वाली जातियों में प्राय: वे बहादुर जातियां भी हैं, जो मुगलों से हारीं तथा उन्हें अपमानित करने के लिए मुसलमानों ने अपने मनमाने काम करवाए थे।

यदि आज हम बचे हुए हैं तो अपने इन्हीं अनुसूचित जाति के भाईयों के कारण जिन्होंने नीच कर्म करना तो स्वीकार किया, लेकिन इस्लाम को नहीं अपनाया।

आज भारत में 23 करोड़ मुसलमान हैं और लगभग 35 करोड़ अनुसूचित जातियों के लोग हैं। जरा सोचिये इन लोगों ने भी मुगल अत्याचारों के आगे हार मान ली होती और मुसलमान बन गये होते तो आज भारत में मुस्लिम जनसंख्या 50 करोड़ के पार होती और आज भारत एक मुस्लिम राष्ट्र बन चुका होता। यहाँ भी जेहाद का बोलबाला होता और ईराक, सीरिया, सोमालिया, पाकिस्तान और अफगानिस्तान आदि देशों की तरह बम-धमाके, मार-काट और खून-खराबे का माहौल होता। हम हिन्दू या तो मार डाले जाते या फिर धर्मान्तरित कर दिये जाते या फिर हमें काफिर के रूप में अत्यंत ही गलीज जिन्दगी मिलती।

धन्य हैं हमारे ये भाई जिन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी अत्याचार और अपमान सहकर भी हिन्दुत्व का गौरव बचाये रखा और स्वयं अपमानित और गरीब रहकर भी हर प्रकार से भारतवासियों की सेवा की।

हमारे अनुसूचित जाति के भाइयों को पूरे देश का सलाम

साभार: 1) हिंदू खटिक जाति: एक धर्माभिमानी समाज की उत्पत्ति, उत्थान एवं पतन का इतिहास, लेखक-
डॉ विजय सोनकर शास्त्री, प्रभात प्रकाशन

2) आजादी से पूर्व कोलकाता में हुए हिंदू मुस्लिम दंगे में खटिक जाति का जिक्र, पुस्तक ‘अप्रतिम नायक:
श्यामाप्रसाद मुखर्जी’ में आया है। यह पुस्तक भी प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है।

by S.k. Burman
वॉया विनय कुमार मौर्य के फेसबुक वाल से

Current status

Today, most are in animal husbandry, agriculture, service industries, and government agencies.

There are some politicians, doctors, engineers, sportspersons and movie stars as well.
Khatik community has a higher sex ratio than Indian national average.
Among the major dalit groups, Khatiks have registered the highest overall literacy rate (64.4 per cent) and highest women literacy rate.

Sonkar
From Wikipedia

Sonkar is a Hindu found in the Bundelkhand region of Madhya Pradesh and Uttar Pradesh in India. It is a main sub-caste of the Khatik community. Historically, the Sonkar were a community of dyers. They are divided into a number of exogamous clans, the main ones being the Magariya, Gotiya and Jaraliya. The community speak the Bundelkhandi dialect of Hindi. In Uttar Pradesh, they are found mainly in the districts of Hamirpur and Jhansi. They worship serpents and considered them to be their protector deities. In Chhattisgarh, Sonker are a different community. They come under Other Backward Classes of India.

खटिक जाति का इतिहास

संदीप देव।

इतिहास जब पढने बैठता हूं तो काफी तकलीफों से घिर जाता हूं। आखिर किस तरह से अंग्रेज व वामपंथी-कांग्रेसी इतिहासकारों ने हमारे गर्व को कुचला है और हमें अपने ही भाईयों से जुदा कर दिया है, अधकचरा इतिहास लिख-लिख कर। खासकर हिंदू समाज को छिन्‍न-भिन्‍न करने का काम जिस तरह से मध्‍यकाल में इस्‍लामी अक्रांताओं ने किया, उसी तरह ब्रिटिश ने हम पर मानसिक गुलामी थोपी और आजादी के बाद वामपंथी-कांग्रेसियों ने उस गुलामी को हर संभव बनाए रखने का प्रयास किया और यह सब केवल मुस्लिम तष्टिकरण के लिए किया गया जबकि सच्‍चाई यह है कि यहां के मुसलमान कोई विदेशी नहीं हैं, बल्कि हमारे ही रक्‍त, हमारे ही भाई है।

खटिक जाति का इतिहास पढ़ रहा था। आज जिसे दलित और अछूत आप मानते हैं न, उस जाति के कारण हिंदू धर्म का गौरव पताका हमेशा फहराता रहा है। खटिक जाति मूल रूप से वो ब्राहमण जाति है, जिनका काम आदि काल में याज्ञिक पशु बलि देना होता था। आदि काल में यज्ञ में बकरे की बलि दी जाती थी। संस्‍कृत में इनके लिए शब्‍द है, 'खटिटक'।

मध्‍यकाल में जब क्रूर इस्‍लामी अक्रांताओं ने हिंदू मंदिरों पर हमला किया तो सबसे पहले खटिक जाति के ब्राहमणों ने ही उनका प्रतिकार किया। राजा व उनकी सेना तो बाद में आती थी। मंदिर परिसर में रहने वाले खटिक ही सर्वप्रथम उनका सामना करते थे। तैमूरलंग को दीपालपुर व अजोधन में खटिक योद्धाओं ने ही रोका था और सिकंदर को भारत में प्रवेश से रोकने वाली सेना में भी सबसे अधिक खटिक जाति के ही योद्धा थे। तैमूर खटिकों के प्रतिरोध से इतना भयाक्रांत हुआ कि उसने सोते हुए लाखों खटिक सैनिकों की हत्‍या करवा दी और एक लाख सैनिकों के सिर का ढेर लगवाकर उस पर रमजान की तेरहवीं तारीख पर नमाज अदा की।

मध्‍यकालीन बर्बर दिल्‍ली सल्‍तनत में गुलाम, तुर्क, खिलजी, तुगलक, सैयद, लोदी वंश आदि और बाद में मुगल शासनकाल में जब डरपोक हिंदू जाति मौत या इस्‍लाम चुनने में से इस्‍लाम का चुनाव कर रही थी तो खटिक जाति ने खुद के धर्म और अपनी बहु बेटियों को बचाने के लिए अपने घर के आसपास सूअर बांधना शुरू किया। इस्‍लाम में सूअर को हराम माना गया है और खटिकों ने मुस्लिम शासकों से बचाव के लिए सूअर पालन शुरू कर दिया। उसे उन्‍होंने हिंदू के देवता विष्‍णु के वराह (सूअर) अवतार के रूप में लिया। मुस्लिम जब गो हत्‍या करने लगे तो उसके प्रतिकार स्‍वरूप खटिकों ने सूअर का मांस बेचना शुरू किया और धीरे धीरे यह स्थिति आई कि वह अपने ही हिंदू समाज में पददलित होते चले गए। कल के शूरवीर ब्राहण आज अछूत और दलित श्रेणी में हैं।

1857 की लडाई में मेरठ व उसके आसपास अंग्रेजों के पूरे के पूरे परिवार को मौत के घाट उतारने वालों में खटिक समाज सबसे आगे था। इससे गुस्‍साए अंग्रेजों ने 1891 में खटिक जाति को अपराधि जाति घोषित कर दिया। अपराधी एक व्‍यक्ति होता है, पूरा समाज नहीं। लेकिन जब आप मेरठ से लेकर कानपुर तक 1857 के विद्रोह की दासतान पढेंगे तो रोएं खडे हो जाए्ंगे। जैसे को तैसा पर चलते हुए खटिक जाति ने न केवल अंग्रेज अधिकारी, बल्कि उनकी पत्‍नी बच्‍चों को इस निर्दयता से मारा कि अंग्रेज थर्रा उठे। क्रांति को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने खटिकों के गांव के गांव को सामूहिक रूप से फांसी दे दिया गया और बाद में उन्‍हें अपराधि जाति घोषित कर समाज के एक कोने में ढकेल दिया।

आजादी से पूर्व जब मोहम्‍मद अलि जिन्‍ना ने डायरेक्‍ट एक्‍शन की घोषणा की थी तो मुसिलमों ने कोलकाता शहर में हिंदुओं का नरसंहार शुरू किया, लेकिन एक दो दिन में ही पासा पलट गया और खटिक जाति ने मुस्लिमों का इतना भयंकर नरसंहार किया कि बंगाल के मुस्लिम लीग के मुख्‍यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि हमसे भूल हो गई। बाद में इसी का बदला मुसलमानों ने वर्तमान बंग्‍लादेश में स्थित नाओखाली में लिया।

आज हम आप खटिकों को अछूत मानते हैं, क्‍योंकि हमें ननका सही इतिहास नहीं बताया गया है, उसे दबा दिया गया है। आप यह जान लीजिए कि दलित शब्‍द का सबसे पहले प्रयोग अंग्रेजों ने 1931 की जनगणना में 'डिप्रेस्‍ड क्‍लास' के रूप में किया था। उसे ही बाबा साहब अंबेडकर ने अछूत के स्‍थान पर दलित शब्‍द में तब्‍दील कर दिया। इससे पूर्व पूरे भारतीय इतिहास व साहित्‍य में 'दलित' शब्‍द का उल्‍लेख कहीं नहीं मिलता है।

हमने और आपने मुस्लिमों के डर से अपना धर्म नहीं छोडने वाले, हिंसा और सूअर पालन के जरिए इस्‍लामी आक्रांताओं का कठोर प्रतिकार करने वाले एक शूरवीर ब्राहमण खटिक जाति को आज दलित वर्ग में रखकर अछूत की तरह व्‍यवहार किया है और आज भी कर रहे हैं। हमें शर्म भी नहीं आती, जिन लोगों ने हिंदू धर्म की रक्षा की, वो लोग ही हमारे समाज से बहिष्‍कृत हैं। आप अपना इतिहास पढिए, नहीं तो आपके पूर्वज आपको माफ नहीं करेंगे और आपकी अगली पीढ़ी सेक्‍यूलर के नाम पर कुत्सित और डरपोक होती चली जाएगी....

साभार: 1) हिंदू खटिक जाति: एक धर्माभिमानी समाज की उत्‍पत्ति, उत्‍थान एवं पतन का इतिहास, लेखक- डॉ विजय सोनकर शास्‍त्री, प्रभात प्रकाशन

2) आजादी से पूर्व कोलकाता में हुए हिंदू मुस्लिम दंगे में खटिक जाति का जिक्र, पुस्‍तक 'अप्रतिम नायक: श्‍यामाप्रसाद मुखर्जी' में आया है। यह पुस्‍तक भी प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है।
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- the glorious history of Hindu Khatik caste





KHATIK CASTE IS BASICALLY A BRAHMIN CASTE WHOSE WORK WAS TO SACRIFICE SACRIFICIAL ANIMALS DURING THE EARLY PERIOD. DURING THE ADI PERIOD, GOATS WERE SACRIFICED IN THE YAJNA. THE WORD FOR THEM IN SANSKRIT IS 'KHATITAKA'.

IN THE MEDIEVAL PERIOD WHEN FEROCIOUS ISLAMIC INVADERS ATTACKED HINDU TEMPLES, THE FIRST KHATIK CASTE BRAHMINS RETALIATED.

THE KING AND HIS ARMY WOULD GET INFORMATION LATER. KHATIK, WHO LIVED IN THE TEMPLE COMPLEX, FIRST ENCOUNTERED HIM.

TIMURLANG WAS FIRST PREVENTED BY KHATIK WARRIORS AT BOTH DEEPALPUR AND AJODHAN AND WAS ALSO THE MOST KHATIK CASTE WARRIOR IN THE ARMY THAT PREVENTED ALEXANDER FROM ENTERING INDIA.


TIMUR WAS SO FRIGHTENED BY THE RESISTANCE OF THE KHATIKAS THAT HE KILLED THOUSANDS OF KHATIK SOLDIERS WHILE SLEEPING, AND OFFERED PRAYERS ON THE THIRTEENTH OF RAMADAN BY PUTTING A HEAP OF ONE LAKH SOLDIERS ON HIS HEAD.


IN THE MEDIEVAL BARBARIC DELHI SULTANATE, DURING THE SLAVES, TURKS, LODI DYNASTY AND MUGHAL RULE, WHEN THE HINDU CASTE OF ATROCITIES WERE ELECTING DEATH OR ISLAM, THE KHATIK CASTE TO PROTECT THEIR RELIGION AND TO SAVE DAUGHTER-IN-LAW FROM THE FILTHY EYES OF THE MUGHALS. STARTED TYING PIGS AROUND THE HOUSE.


IN ISLAM, BOAR IS CONSIDERED HARAM. THE MUGHALS CONSIDERED IT FORBID TO SEE IT. AND THE KHATIKAS STARTED REARING PIGS TO GUARD AGAINST MUSLIM RULERS. HE TOOK HIM AS THE VARAHA (BOAR) INCARNATION OF THE HINDU GOD VISHNU.


IN RESPONSE TO THE COW SLAUGHTER OF THE MUSLIMS, THE KHATIKAS STARTED SELLING PORK AND SLOWLY CAME THE SITUATION THAT THEY WENT INTO THEIR OWN HINDU SOCIETY. THAT IS, THE BRAVE BRAHMINS OF TOMORROW ARE IN THE UNTOUCHABLE AND DALIT CATEGORY TODAY.


IN THE BATTLE OF 1857, THE KHATIK SOCIETY WAS AT THE FOREFRONT OF KILLING ENTIRE FAMILIES OF THE BRITISH IN AND AROUND MEERUT. ANGRY WITH THIS, THE BRITISH DECLARED THE ENTIRE KHATIK CASTE TO BE A WANTED AND CRIMINAL CASTE IN 1891.


WHEN YOU READ THE REVOLT OF 1857 REBELLION FROM MEERUT TO KANPUR, YOU WILL BECOME ROWDY. JUST AS THE KHATIK CASTE, WHILE ON THE TIT, KILLED NOT ONLY THE BRITISH OFFICERS, BUT ALSO THEIR WIFES CHILDREN MERCILESSLY THAT THE BRITISH TREMBLED.


AFTER CRUSHING THE REVOLUTION, THE BRITISH COLLECTIVELY HANGED THE VILLAGE OF THE VILLAGE OF KHATIKAS AND LATER DECLARED THEM CRIMINALS AND PUSHED THEM INTO A CORNER OF SOCIETY.


WHEN MOHAMMED ALI JINNAH ANNOUNCED DIRECT ACTION BEFORE INDEPENDENCE, MUSLIMS STARTED MASSACRE OF HINDUS IN KOLKATA CITY, BUT IN A COUPLE OF DAYS, THE DICE TURNED AND KHATIK CASTE MASSACRED MUSLIMS SO BADLY THAT MUSLIM LEAGUE OF BENGAL THE MINISTER SAID PUBLICLY THAT WE HAD MADE A MISTAKE. LATER, MUSLIMS TOOK REVENGE FOR THIS AT NOAKHALI IN BANGLADESH.


TODAY WE CONSIDER KHATIKAS AS UNTOUCHABLES, BECAUSE WE HAVE NOT BEEN TOLD THEIR TRUE HISTORY, IT HAS BEEN SUPPRESSED. LET US KNOW THAT THE TERM DALIT WAS FIRST USED BY THE BRITISH IN THE 1931 CENSUS AS A 'DEPRESSED CLASS'. BABA SAHEB AMBEDKAR CHANGED IT TO THE WORD DALIT IN PLACE OF UNTOUCHABLES.


EARLIER, THE MENTION OF THE WORD 'DALIT' IS NOT FOUND ANYWHERE IN INDIAN HISTORY AND LITERATURE.


WE AND YOU, WHO HAVE NOT LEFT THEIR RELIGION DUE TO THE FEAR OF MUSLIMS, HAVE BEEN TREATED AS UNTOUCHABLES BY KEEPING THE BRAHMIN KHATIK CASTE IN THE DALIT CLASS, WHO ARE HARSHLY RETALIATING TO THE ISLAMIC INVADERS THROUGH VIOLENCE AND PIGGERY.


INDIA HAD ONLY 1 PERCENT UNTOUCHABLE CASTE IN 1000 AD, BUT BY THE END OF THE MUGHAL DYNASTY, THEIR NUMBER INCREASED TO 14 PERCENT. AFTER ALL HOW?


MOST OF THESE SCHEDULED CASTES ARE IN PRESENT DAY UTTAR PRADESH, BIHAR, BENGAL, CENTRAL INDIA, WHERE THERE WAS DIRECT INTERVENTION OF MUGHAL RULE AND WHERE MOST CONVERSION TOOK PLACE. TODAY, MOST OF THE MUSLIM POPULATION IS ALSO IN THESE REGIONS, WHICH WERE CONVERTED.


DR. SUBRAHMANIAN SWAMY WRITES, “THE SCHEDULED CASTES ARE DESCENDANTS OF THE SAME BRAVE BRAHMINS AND KSHATRIYAS WHO ACCEPTED OUT OF CASTE, BUT DID NOT ACCEPT THE FORCED CONVERSION OF THE MUGHALS. TODAY'S HINDU SOCIETY SHOULD BE THANKFUL TO THEM, THEY SHOULD BOW DOWN TO THEM, BECAUSE THEY NEVER LET THE HINDU SAFFRON FLAG BOW DOWN, EVEN IF THEY THEMSELVES SUFFERED HUMILIATION AND OPPRESSION. "


PROFESSOR SHERRING HAS ALSO CLEARLY WRITTEN IN HIS BOOK " HINDU TRIBES & CASTES " THAT "THE LOW CASTE PEOPLE OF INDIA ARE NONE OTHER THAN BRAHMINS AND KSHATRIYAS".


STANLEY RICE, IN HIS BOOK " HINDU CUSTOMS AND THEIR ORIGINS ", ALSO WROTE THAT AMONG THE CASTES CONSIDERED UNTOUCHABLES, THEY ARE ALSO BRAVE CASTES WHO LOST THEIR LIVES TO THE MUGHALS AND HUMILIATED THEM BY THE MUSLIMS WHO DID THEIR ARBITRARY WORK.


IF WE ARE LEFT TODAY, THEN DUE TO THESE SAME SCHEDULED CASTE BROTHERS, WHO ACCEPTED TO DO INFERIOR DEEDS, BUT DID NOT ADOPT ISLAM.


TODAY INDIA HAS 23 CRORE MUSLIMS AND ABOUT 35 CRORE SCHEDULED CASTES. JUST THINK THAT THESE PEOPLE TOO WOULD HAVE GIVEN UP IN THE FACE OF MUGHAL ATROCITIES AND HAD BECOME MUSLIMS, TODAY THE MUSLIM POPULATION IN INDIA WOULD HAVE CROSSED 50 CRORES AND TODAY INDIA WOULD HAVE BECOME A MUSLIM NATION.


HERE TOO JIHAD WOULD DOMINATE AND LIKE IN COUNTRIES LIKE IRAQ, SYRIA, SOMALIA, PAKISTAN AND AFGHANISTAN, THERE WOULD BE AN ATMOSPHERE OF BOMBING, KILLING AND BLOODSHED. WE HINDUS WOULD HAVE EITHER BEEN KILLED OR CONVERTED OR WE WOULD HAVE GOT EXTREMELY GULLIBLE LIVES AS KAFIRS.


BLESSED ARE OUR BROTHERS WHO HAVE KEPT THE PRIDE OF HINDUTVA EVEN AFTER ENDURING ATROCITIES AND INSULTS FROM GENERATION TO GENERATION AND HAVE SERVED THE PEOPLE OF INDIA IN EVERY WAY EVEN AFTER BEING HUMILIATED AND POOR.

Sources:


1. HINDU KHATIK CASTE: HISTORY OF THE ORIGIN, RISE AND FALL OF A RELIGIOUS SOCIETY , AUTHOR- DR. VIJAY SONKAR SHASTRI, PRABHAT PRAKASHAN


2. THE MENTION OF THE KHATIK CASTE IN THE HINDU MUSLIM RIOTS IN KOLKATA BEFORE INDEPENDENCE, IS MENTIONED IN THE BOOK 'APATIM NAYAK: SHYAMAPRASAD MUKHERJEE '. THIS BOOK IS ALSO PUBLISHED BY PRABHAT PRAKASHAN.

Khatik Samaj Gotra

List of Khatik Samaj Gotra

गोत्र जिसका अर्थ वंश भी है । यह हमें हमारे पूर्वजों की याद दिलाता है और हमें हमारे कर्तव्यों के बारे में बताता है । मानव जीवन में समाज की तरह गोत्रों का बहुत महत्त्व है ,यह हमारे पूर्वजों का याद दिलाता है साथ ही हमारे संस्कार एवं कर्तव्यों को याद दिलाता रहता है । इससे व्यक्ति के वंशावली की पहचान होती है एवं इससे हर व्यक्ति अपने को गौरवान्वित महसूस करता है ।

ये किसी न किसी गाँव, पेड़, जानवर, नदियों, व्यक्ति के नाम, ॠषियों के नाम, फूलों या कुलदेवी के नाम पर बनाए गए है ।


Agrawar Aganpal Azudhiyawasi
Admankar Amethiya Avindra
Awwalkar Arumaankar Ahediya
Aharwar Aarkwansh Aandekar
Arjumankar Agal Ditikar Ayodhyawaskar
Adayna Atroliya Avdhi
Aswal Ahwan Asoliya
Ahwan Arcwanshi Aashiwaal
Ikshaku Indoriya Irchhaiya Idana
Imliha Ilekar Ujjenia
Udan Ushakar Untgiriya
Udmatiya Aujniya Aud
Kaktheriya Katraha Katariya
Kandool Katheria Kanwazia
Kambaal Kangankar Patariya
Karnkotkar Katatiya Katrolya
Kannojkar Kariya Karariya
Karchhaiya Karhariya Kalchuri
Karoshiya Kaskarkar Kaamle
Kankre Kantekar Katrolliya
Kaarti Kiwar Kukrethe
Kukrelekar Kumbhbhal Kushmaiya
Kushmaha Kulchor Kuiri
Kaindhaha Kaishrohliya Kotiya
Kotarkar Koyalkar Kohwaal
Karadiya Kalchhariya Kalal
Kalyankar Kasretiya Kahariya
Kamble Kamblekar Kagchhare
Kampetkar Kakusth Kirar
Kirarkar Kukraulya Kunekar
Kune Kumbharkar Kukraha
Kushwaha Kunvraha Keral
Kailiha Kothmeerkar Kotpaal
Korekar Kolab Korwan
Kaushik Kura Katti
Kadigekar Khared Kharwand
Kkash Kharkodiya Khinchi
Khilwad Khatwa Khara
Kharwang Khal Khatwanshi
Khanjapuri Khitoliya Khinchiwar
Kheentwal Khaidru Khoka
Khokra Khatri Kheraha
Kairwar Khairwal Khoaar
Khokakhra Gangnerkar Gazmoti
Gajarwanshi Garhwasiya Gandheela
Gaharwar Ganwar Gaikwad
Gurkhanda Gurawa Guhil
Goojar Gogliya Gopal Putikar
Gorkha Godakar Gajar
Gajvinkar Garrhwaliya Gandaha
Gajjaha Gahletu Gaikwadkar
Guptwanshi Gurha Guloo, Anguri
Gate Garewariya Gogikar
Gor Gohil Gaulikar
Gholap Ghanhoriya Ghatmaha
Ghagha Ghurha Ghonghat
Ghatkekar Ghamaha Ghuraa
Ghoote Ghodchadha Chakole
Chandpuriya Chandseniya Chamruwa
Chalukya Chawla Chandel
Chandrma Chandosiya Chamreth
Chanwda Chik Chikwa
Chak Chittapurkar Chusaha
Chubraha Chetiwal Chailaha
Chaundla Chobriya Chaurashiya
Chinnpahariya Churihaar Chetiwar
Cheri Chola Chaudhary
Chauhaan Chhangel Chharchholiya
Chhindwadiya Chhipadiya Chhatrapal
Chhutaha Chhatniha Chhindak
Chhipatiya Chhilwar Jagmaalaut
Jamdedkar Jaymumal Jaatingkar
Jadhaw Jigarwaal Jirawelkar
Jujhatiya Jagawat Jamalkar
Jangriya Jangra Jande Jawriya
Jeerakar Jaiswal Jujhariya
Johari Jhondiware Tandonkar
Tundelkar Tanki Tiguliya
Tipan Tundele Toda
Tank Tankchhoda Tigrekar
Tuklaya Tokniha Thakutia
Thagele Daagpadikar Dipaal
Dodiya Dodwa Deedbaniya
Dogra Dod Dhadi
Dhudharu Dhoodham Dhoraha
Dhinwaar Dhunda Dhodwa
Tanoor Tamar Tunwar
Tomer Tanwar Taretiya
Tariha Titoriya Tiwriha
Teria Tapswikar Tamori
Tassera Toil Tambre
Tobde Tilhetia Tegrekar
Tupukar Totarkar Totarkar
Dabbikar Dandothikar Dalalkar
Daheliha Daagman Dahimakar
Dilwariya Dhudhar Dewaliya
Dabulkar Dariyawadi Daleriya
Dagon Dahima Dilwanchre
Deepal Debupuriha Dhangar
Dhanpali Dhrmakalikar Dhaariwal
Dhramkar Dharke Dhanaskr
Dhariya Nagekar Naagekar
Zajjrekar Nabbriya Narwariya
Narawriha Nagar Naarnoliya
Nawle Nikas Nimnotia
Dandotiya Nirwani Nekya
Neniwar Nelturkar Nohaani
Nelthurikar Nadmeedkar Nagelihiya
Naratiya Narwarkar Naga
Nagoriya Naraamuha Nikumbh
Nizamkar Nirwaan Nimivansh
Nemthabedkar Netkar Nethikar
Netkar Nolyawariya Nemthawadkar
Pakdethkar Pachchisiya Padiwal
Padihar Pattarphod Panskar
Patariya Paprendaha Parewa
Parihaar Palwaan Pakiwaarkar
Pachauri Padiwaar Patharkata
Patriha Patel Patariya
Pariwariya Paramdevkar Parsendiya
Palemkar Pahariya Palkiha
Prathwirajiya Pratihaar Panwarkar
Pawar Pardi Paalwansh
Paarsoliya Pirtewal Pujarikar
Purauliha Puldandkar Pokalkar
Pahadkar Pahrole Prabhashi
Panchal Pardhi Palgatodkar
Pipraullya Pipar Pundeer
Pulkundkar Pushkalkar Pramaar
Poriya Phagaudiaya Pharshatare
Philwaar Phoondna Pharenjia
Falke Feemapuriya Phooltodkar
Baksriha Bangwar Bargayan
Bachhri Bazrethiya Batrollya
Badhariya Baddak Banphukar
Bandaha Banipaal Babar
Banari Banuwal Barkhedia
Bangarwal Bagauda Baghele
Bachheriya Badgujjar Badwaar
Badail Banaphar Banipariha
Banbate Banbata Bansaude
Bansabdekar Barma Barauliha
Bawediya Balahir Banshiwal
Baswal Baswala Basuwal
Bag Ninneniya Baagwarkar Baghodiya
Baamote Bidikikar Biparwaal
Bilkar Bilodaiya Balodariya
Bilriha Birha Bundela
Bootauliya Bemte Boriwaal
Barsaniya Balhaar Basantiha
Banshiwalkar Bagoriya Bag
Bagri Bagrikar Bajuaaniya
Bahubal Bidari Bibusherkar
Bilbolkar Biltoriya Bilhatiya
Bhadarikar Bijapurkar Buyakar
Boontiwal Beman Bobrishikar
Beruaar Bhattiwal Bhadoriya
Bhamewariya Bhalekar Bhatiya
Bhilware Bhusaha Bhembariya
Bhadkariya Bhadoriyakar Bharaniyan Bhagele
Bhagoriya Bhanunathkar Bhilwarkar
Bhupaniya Bhupaniyan Bhairampuriha
Bhaishamaar Bhojpuriya Bhopale
Bhonika Bhonshle Bhauraha
Bhojak Bhodiware Bhonia
Bhoslekar Magwasiya Machhriyaha
Machhulkar Mandal Maturiya
Mandawat Mandiya Mandmeche
Madanpuriya Mandhanha Marhate Malakpuriya
Malawaliya Mawaniyan Mahaar
Mahar Mathkedkar Manke
Maaljauniya Mawi Mirnaniya
Milatkar Munde Muraw
Multaniya Medwariya Maidarkar Mogha
Maudak Marauni Mangalgirikar
Manrekar Matikekar Mandele
Maalaut Madere Madne
Mankotiya Manake Jasrotiye
Malkar Malbaniya Mallekedkar
Mahadwadiya Maharbaniya Manikkar
Maroo Mori Maltunkar
Maahune Miryalkar Muchkundkar
Murarikar Munga Mendhikar
Mokhari Mohna Mohaniya
Mouryawansh Yaduwanshi Yadav
Yadekar Raghuwanshi Ratanbhuliya
Rathparkar Rajpaali Rajaorekar
Rathi Rathaurkar Raawkar
Roorkeewal Rekwaar Raitgi
Rohtak Ratnakar Ratwaha
Raagikar Rajaura Rajaure
Raagikar Rathor Raw
Riwariya Rewariya Roopleya
Ramkheriya Rewatwanshi Rod
Ladoose Laarowa Laarokar
Lichchhawi Landhekar Lingwelkar
Lemlora Longla Vaankar
Baankar Vaishyawanshi Shambhukar
Shapurkar Sheenet Shabbalkar
Shivkar Shreenetkar Sagan
Sakurabadi Sathpurkar Sanwariya
Spre Sapere Sarwaliya
Saghiya Satyakar Sadanandkar
Sanwaiya Sarwariya Sambhaliya
Salapliya Sawai Sankhala
Sangriya Sanbada Sanwariya
Sahujikar Sindhiya Saindhaw
Seekarwal Sisodiya Subalkar
Suryakar Sekhawat Sejawar
Sedamakar Sokhar Sople
Somwansh Somwanshi Saodagarkar
Solanki Saarkotkar Saira
Sagarkar Sabankar Sawankar
Sabenkar Sabinkotkar Sahebdadakar
Sahebbadkar Sikadiya Sikriya
Sikarwarkar Seementari Subal
Sujanmulkar Soorwar Surveer
Sengarwar Sezwarkar Seriha
Sokharkar Sombata Somwanshkar
Sauroorkar Solankikar Haqimkar
Hamiriya Hasgorkar Hingolokar
Hirekar Haudekar Hanukar
Hanumankar Harapuriya Hasanpuriya
Hinnwar Holakar Tepan
Khinchi Panwar Tanwer
Solanki Chandel Shankhla
Chauhan Sonkar Suryavanshi
Badgujar Bundela Diama
Nagora Ameria Butiya
Parewa Badgota Chanwla
Samaria Tank Malhotra
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bhagoria Bursiay Paharia
Rajoria Baghdi Aswal
Baswal Gangwal Baniwal
Kamwal Chinwal Khoywal
Narania Kirad Bansiwal
Toshawada Paliwal Mahandwaria

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